नई दिल्ली। आम्रपाली ग्रुप का नाम तो हालांकि बौद्धकाल में वैशाली के लिक्ष्वी राजवंश की राजनर्तकी आम्रपाली के नाम पर रखा गया था, लेकिन इस रियल स्टेट कंपनी में बुद्ध जैसी सादगी नहीं थी। चारों तरफ बस पैसे का खेल और पैसों को काला सफेद का धंधा ही चल रहा था। पैसा उन भोले भाले लोगों का लूटा जा रहा था, जो अपनी जीवनभर की कमाई एक घर के नाम पर आम्रपाली ग्रुप में जमा कर रहे थे। लेकिन आम्रपाली के मालिक अनिल शर्मा तो और ही खेल रहे थे, और आम लोगों के इस पैसे अपनी हैसियत बढ़ा रहे थे और सांसद बनने के सपने देख रहे थे। लेकिन अंत में न तो वह सांसद बने और न ही कारोबारी रह गए। आज वह सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर जेल में हैं, और उनके कारनामों की लिस्ट रोज-रोज बढ़ती ही जा रही है।
पैसा कमाते ही सांसद बनने के चक्कर में पड़ गए
आम्रपाली के मालिक अनिल शर्मा ने उल्टे सीधे सभी तरीकों से खूब धन कमाया। पैसा ज्यादा हो गया तो उनका मन सांसद बनने के सपने देखने लगा। इस सपने को पूरा करने के लिए उन्होंने 2014 में लोकसभा चुनाव जहानाबाद से लड़ा। उस वक्त उनको जदयू ने टिकट दिया था। अनिल शर्मा ने टिकट लेने के बाद पैसों की दम पर चुनाव लड़ा और पानी की तरह पैसा बहाया। लेकिन अंत में उनको हार ही मिली। लेकिन इस हार से उन्होंने हार नहीं मानी और लोकसभा चुनाव के ठीक बाद बिहार में राज्यसभा की सीट के लिए दांव चला। उस दौरान जनता दल यूनाइटेड में असंतोष था और अनिल शर्मा ने जदयू के बागी विधायकों की मदद से राज्यसभा जाने का रास्ता चुना। हालांकि यहां भी पैसा खर्च करने के बाद वह चुनाव नहीं जीत पाए।
आखिर हैं कौन ये अनिल शर्मा
पटना से करीब 50 किलोमीटर दूर पंडारक गांव में अनिल शर्मा का जन्म एक साधारण किसान परिवार में हुआ। बचपन से ही वह पढ़ने में काफी तेज थे। मैट्रिक में अच्छे नम्बरों से पास होने के बाद उन्होंने पटना साइंस कॉलेज में दाखिला लिया। अनिल शर्मा ने यहां पढ़ के बाद इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षा दी और बीटेक की पढ़ाई के लिए एनआईटी कटक को चुना। उन्होंने सिविल इंजीनियरिंग में डिग्री हासिल लेने के बाद स्ट्रक्चरल इंजिनीयरिंग में आईआईटी खड़गपुर से एमटेक की डिग्री भी हासिल की।
सरकारी नौकरी से की शुरुआत
अनिल कुमार शर्मा को इंजीनियरिंग करते ही नौकरी मिल गयी। उन्होंने एनटीपीसी से अपने कॅरियर की शुरुआत की। यहां पर काम करने के दौरान ही उन्हें मौका मिला और वह नेशनल प्रोजेक्ट्स कंस्ट्रक्शन कंपनी में चले गए। यहां से उन्होंने बिहार सरकार के नगर विकास विभाग में असिस्टेंट इंजीनियर के रूप में अपनी शुरुआत की। इस दौरान उनका तबादला हाजीपुर नगर पालिका में हुआ। 1981-82 में वे हाजीपुर नगर पालिका में असिस्टेंट इंजीनियर में रहे। लेकिन यहां आकर उन्हें लगा कि सरकारी नौकरी उनके सपने पूरे नहीं कर पाएगी। उस समय वे एक कार खरीदने तक को तरस रहे थे। अंत में उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़ी और नोएडा में जम गए। इस काबिल सिविल इंजीनियर ने कुछ ही समय में यहां अपनी हैसियत बना ली।
रोचक है आम्रपाली नाम का चयन
अनिल शर्मा ने कंपनी का नाम इतिहास के पन्नों से खोजा था। बौद्धकाल में वैशाली के लिक्ष्वी राजवंश में एक राजनर्तकी थी, जिसका नाम आम्रपाली था। उसने वैशाली राज्य की एकता और अखंडता के लिए अपने जीवन को दांव पर लगा दिया था। अनिल शर्मा ने भी एक बार कहा था कि उन्होंने इतिहास की इस राष्ट्रभक्त महिला के नाम को अपनी कंपनी के नाम के लिए चुना है। आम्रपाली ने 2003 में पहला प्रोजेक्ट शुरू किया और 2 साल के अंदर ही नोएड़ा में 174 फ्लैट बना कर अपनी धाक जमा ली। फिर तो उनका यह धंधा चल ही निकला। लेकिन यह कामयाबी अनिल शर्मा का नशा बन गई। इसके चलते वह सही गलत का अंतर ही भूल गए। उन्होंने बिहार कैडर के कई आईएएस, आईपीएस अफसरों का काला धन इसमें लगाया। इन अफसरों के साथ मिलकर नोएडा की महंगी जमीने मामूली कीमतों में खरीदी गई और निवेशकों को खूब लूटा गया। आखिरकार उनका भांडा फूट और उनका काला कारोबार अदालत के सामने है।
ऐसे शुरू हुई आम्रपाली ग्रुप के दुर्दिन की शुरुआत
अगस्त 2014 में लखीसराय में शिक्षण संस्थान बालिका विद्यापीठ के प्रमुख कुमार शरद चंद्र की हत्या होती है। इसमें अनिल शर्मा नाम आता है। दरअसल अनिल शर्मा ने लखीसराय में एक इंजीनियरिंग कॉलेज खोला था। जानकारों के अनुसार इंजीनियरिंग कॉलेज की जमीन को लेकर विवाद था। इसके चलते अनिल शर्मा कई दिनों फरार भी रहना पड़ा। यही से उनके पतन की शुरुआत शुरू हुई, जिसने उनको जेल पहुंचा दिया। हालांकि मामला यहीं खत्म हुआ है। उनसे जुड़ मामले रोज सामने आ रहे हैं। फिलहाल वे पिछले 5 महीने से जेल में हैं।
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