मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल का पहला बजट वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण 5 जुलाई को पेश करेंगी। जानकारी दें कि यह सीतारमण का पहला बजट होगा।
नई दिल्ली: मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल का पहला बजट वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण 5 जुलाई को पेश करेंगी। जानकारी दें कि यह सीतारमण का पहला बजट होगा। इस दौरान उनके सामने कई चुनौतियां आई हैं। बता दें कि अर्थव्यवस्था की रफ्तार सुस्त है। बढ़ते एनपीए ने वित्तीय सेक्टर की मुश्किलें बढ़ा रखी हैं, वहीं एनबीएफसी में नकदी का संकट है, और तो नए रोजगार तैयार करने हैं। निजी निवेश और निर्यात में जान फूंकना है। ऐसे में इस बजट से कई उम्मीदें की जा रही हैं। आपको बता दें कि बजट पेश करने के दौरान वित्त मंत्री कुछ ऐसे शब्दों का इस्तेमाल करते हैं, जो आम बोलचाल भाषा में समझना थोड़ा मुश्किल होता है। इसलिए हम आपको ऐसे ही कुछ शब्दों के बारे में बता रहे हैं, जिनके बारे में अगर आप जानकारी रखेंगे, तो बजट को आसानी से समझ पाएंगे।
बजट क्या है?
बजट सरकार के वार्षिक आय और व्यय का विस्तृत ब्योरा होता है। हर वित्त वर्ष का बजट पेश किया जाता है। जिस बजट में सरकार का खर्च उसकी आय के मुताबिक होता है उसे बैलेंस्ड यानी संतुलित बजट कहा जाता है। यदि सरकार की आय कम और व्यय अधिक होता है, तो इसे रेवेन्यू डेफिसिट बजट कहा जाता है। यदि सरकार का कुल खर्च इसकी आय से अधिक होता है तो इसे फिस्कल डेफिसिट कहा जाता है। मगर इसमें कर्ज को शामिल नहीं किया जाता है।
बजट में इस्तेमाल होने वालें शब्द
डायरेक्ट टैक्स: जानकारी दें कि डायरेक्ट टैक्स वह टैक्स होता है, जो किसी भी व्यक्ति व संस्थान की आय, संस्थानों की आय और उसके स्रोत पर लगता है। इनकम टैक्स, कॉरपोरेट टैक्स, कैपिटल गेन टैक्स और इनहेरिटेंस टैक्स इस कैटेगरी में आते हैं।
इनडायरेक्ट टैक्स: इनडायरेक्ट टैक्स किसी भी उत्पादित वस्तुओं पर लगने वाला टैक्स होता है। इतना ही नहीं इसके अलावा यह आयात-निर्यात वाले सामान पर उत्पाद शुल्क, सीमा शुल्क और सेवा शुल्क के जरिय भी लगाया जाता है।
जीडीपी : बता दें कि जीडीपी एक वित्त वर्ष के दौरान देश के भीतर कुल वस्तुओं के उत्पादन और देश में दी जाने वाली सेवाओं का टोटल होता है।
फाइनेंस बिल : इस बिल को बजट पेश करने के तुरंत बाद लोकसभा में पेश किया जाता है। इस विधेयक में बजट में प्रस्तावित करों को लागू करने, हटाने, घटाने, बढ़ाने या नियमों में अन्य बदलावों की विस्तार से जानकारी होती है।
फिस्कल पॉलिसी: यह सरकार की वह नीति है, जो सरकार रेवेन्यू और खर्च के विषय में बनाती है। इस नीति को बजट के जरिये लागू किया जाता है. इसका अर्थव्यवस्था पर बहुत असर पड़ता है।
मॉनिट्री पॉलिसी : भारतीय रिजर्व बैंक की इस नीति के जरिये अर्थव्यवस्था में पैसे की सप्लाई और ब्याज दरों पर फैसला लिया जाता है। इसका अर्थव्यवस्था पर सीधा असर होता है। वहीं अर्थव्यवस्था में लिक्विडिटी बनाए रखने के लिए इसका इस्तेमाल होता है। महंगाई, बैलेंस ऑफ पेमेंट और रोजगार के स्तर में इसकी भूमिका अहम होती है।
इनकम टैक्स : यह एक व्यक्ति की विभिन्न स्रोतों से कमाई गई आय पर लगने वाला टैक्स है। इसमें सैलरी के अलावा ब्याज, निवेश पर रिटर्न आदि शामिल है। इस आय पर अलग-अलग स्लैब के अनुसार टैक्स देना पड़ता है।
नेशनल डेट : यह केंद्र सरकार द्वारा लिया गया कुल कर्ज है। यह कर्ज सरकार को चुकाना होता है। आम तौर पर सरकार पहले के बजट घाटे को पूरा करने के लिए यह कर्ज लेती है।
इंफ्लेशन : काफी सरल भाषा में इसे मंहगाई दर भी कहा जाता है। वहीं अर्थव्यवस्था में एक निश्चित समयावधि में किसी वस्तु या सेवा के बढ़े हुए दाम को महंगाई दर कहा जाता है। समय के साथ-साथ व्यक्ति एक निश्चित राशि में कम उत्पाद व सेवाएं खरीद पाता है। जानकारी दें कि इसे ही मंहगाई दर कहते हैं। इसके चलते खर्च करने की उसकी क्षमता घटती जाती है। भारत में महंगाई दर का आकलन कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स से किया जाता है। इसे खुदरा महंगाई दर भी कहा जाता है। अर्थव्यवस्था की मजबूती के लिए रिजर्व बैंक इसे काबू में रखने का प्रयास करता है।
डिसइंवेस्टमेंट: सरकार किसी एसेट की पूर्ण या आंशिक रूप में बिक्री कर उससे पैसा हासिल करती है। यह एक रणनीतिक कदम होता है। इसके जरिये सरकार पैसा जुटाती है।
बैलेंस ऑफ पेमेंट: भुगतान संतुलन (बीओपी) खाता किसी देश और शेष विश्व के बीच सभी मौद्रिक कारोबार का लेखा-जोखा हाता है। आसान शब्दों में कहा जाए तो किसी एक देश और शेष दुनिया के बीच हुए वित्तीय लेन-देन के हिसाब को बैलेंस ऑफ पेमेंट यानी भुगतान संतुलन कहा जाता है।
उत्पाद शुल्क : देश में उत्पादित होने वाली वस्तुओं पर जो टैक्स लगता है उसे उत्पाद शुल्क कहा जाता है। यह एक तरह का कर होता है जो कि एक देश की सीमाओं के भीतर बनने वाले सभी उत्पादों पर लगता है।
ये भी अवश्य जानें
रेवेन्यू डेफिसिट: यह सरकार के रेवेन्यू खर्च और रेवेन्यू आय के बीच का फर्क बताता है।
फिस्कल कंसॉलिडेशन : इसका लक्ष्य सरकार के घाटे और कर्ज में कमी लाना है।
एग्रीगेट डिमांड: यह किसी भी अर्थव्यवस्था में सभी उत्पादों और सेवाओं की कुल मांग है।
गवर्मेंट बॉरोइंग: वह रकम जो सरकार लोक कल्याण और सार्वजनिक सेवा योजना पर खर्च करने के लिए कर्ज के रूप में लेती है।
बजट घाटा : जब खर्चा सरकार के राजस्व से ज्यादा हो जाता है, तब पैदा होने वाली स्थिति को ही बजट घाटा कहते हैं।
सीमा शुल्क: देश में आयात होने वाली वस्तुओं पर सीमा शुल्क अथवा कस्टम ड्यूटी लगती है.
बैलेंस बजट : जब सरकार का राजस्व मौजूदा खर्च के बराबर होता है, तो उसे बैलेंस बजट का नाम दिया जाता है।
बॉन्ड : पैसा जुटाने के लिए सरकार अक्सर बॉन्ड जारी करती है। यह कर्ज का एक सर्टिफिकेट होता है।
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