ये है नौकरियां बढ़ाने का फार्म्यूला, नई सरकार को करना होगा ये काम

नई दिल्ली। लोकसभा चुनाव 2019 के बाद बनने वाली नई सरकार के लिए जो चुनौतियां होंगी, उनमें रोजगार का मसला काफी अहम है। मोदी सरकार में नीति आयोग के उपाध्यक्ष रहे अरविंद पनगढ़िया (Arvind Panagariya) ने नई सरकार के लिए रोजगार के मसले पर कुछ सुझाव दिए हैं। जनवरी, 2015 से अगस्त, 2017 तक नीति आयोग के उपाध्यक्ष रहे अरविंद पनगढ़िया (Arvind Panagariya) का कहना है कि भारत में सुधार की प्रक्रिया अगले 5 साल में निश्चित रूप से पूरी हो जानी चाहिए। भारत को लेबर श्रम आधारित सेक्टर की ग्रोथ पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए, जिससे कि अधिक से अधिक नौकरियां लोगों को मिल सके।

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अरविंद पनगढ़िया (Arvind Panagariya) ने भारत में हो रहे लोकसभा चुनावों के बाद बनने वाली अगली सरकार के लिए आवश्यक प्राथमिकताओं के बारे में पूछे जाने पर यह बात कही। कोलंबिया यूनिवर्सिटी में भारतीय आर्थिक नीतियों से जुड़े एक केंद्र के निदेशक पनगढ़िया ने कहा, "मेरा निजी विचार है कि भारत को आगामी पांच वर्ष में अपनी सुधार प्रक्रिया पूरी कर लेनी चाहिए।"

बता दें, नौकरियों के मामले पर विपक्ष हमेशा से नरेंद्र मोदी सरकार को निशाना बनाता रहा है। NSSO की एक लीक रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2018 के दौरान देश में बेरोजगारी दर 45 साल में सबसे अधिक हो गई।

इन सेक्टर पर करना होगा फोकस
अरविंद पनगढ़िया (Arvind Panagariya) ने बताया कि भारत को टेक्सटाइल, जूता-चप्पल, फर्नीचर, रसोई से जुड़े सामान एवं ऐसे अन्य सेक्टर की प्रगति पर अधिक ध्यान देना चाहिए, जिसमें कामगारों की आवश्यकता अधिक होती है। उन्होंने कहा कि हमें इन सेक्टर्स में ग्लोबल स्तर पर प्रतिस्पर्धी कंपनियों की जरूरत है जो उस एक्सपोर्ट मार्केट पर दबदबा कायम कर सकें, जिससे चीन अधिक लागत के कारण बाहर निकल रहा है। अरविंद पनगढ़िया ने कहा कि ऐसा करने के लिए श्रम कानून को आसान बनाने की जरूरत पड़ेगी। पनगढ़िया ने सुझाव दिया कि चीन के शेनझेन स्टाइल वाले कोस्टल इम्प्लॉयमेंट जोन की तरह इम्प्लॉयमेंट जोन बनाने होगे। चीन का यह क्षेत्र आंत्रप्रेन्योर के लिए काफी अच्छा माना जाता है।

बैंक निजीकरण पर गंभीरता से सोचने की जरूरत
पीएसयू बैंकों के निजीकरण पर अरविंद पनगढ़िया (Arvind Panagariya) ने कहा कि यह ऐसा समय है जब हमें सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के निजीकरण पर गंभीरता से सोचने की जरूरत है। प्राइवेट और विदेशी बैंकों में एनपीए की समस्या सरकारी बैंकों की तरह परेशान करने लायक नहीं है।

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