ग्लोबल एजेंसी फिच ने अगले वित्त वर्ष के लिए भारत की आर्थिक वृद्धि दर का पूर्वानुमान घटाकर 6.80 फीसदी कर दिया है।
नई दिल्ली: ग्लोबल एजेंसी फिच ने अगले वित्त वर्ष के लिए भारत की आर्थिक वृद्धि दर का पूर्वानुमान घटाकर 6.80 फीसदी कर दिया है। जी हां फिच रेटिंग्स (Fitch Ratings) ने इकोनॉमिक ग्रोथ में कमजोरी के अनुमान के साथ भारत को तगड़ा झटका दिया है। ग्लोबल रेटिंग एजेंसी ने शुक्रवार को अगले वित्त वर्ष यानी 2019-20 के लिए भारत का जीडीपी (GDP) ग्रोथ अनुमान 7 फीसदी से घटाकर 6.8 फीसदी कर दिया है। इसके साथ ही फिच रेटिंग्स (Fitch Ratings) ने मार्च, 2019 में समाप्त हो रहे चालू वित्त वर्ष के लिए ग्रोथ अनुमान में कमी कर दी है।
बता दें कि चालू वित्त वर्ष के लिए भी घटाया जीडीपी ग्रोथ अनुमान रेटिंग एजेंसी ने अपने ताजा ग्लोबल इकोनॉमिक आउटलुक (Global Economic Outlook) में वित्त वर्ष 2018-19 के लिए जीडीपी ग्रोथ अनुमान को घटाकर 6.9 फीसदी कर दिया, जबकि दिसंबर एडिशन में 7.2 फीसदी का अनुमान जाहिर किया गया था। चालू वित्त वर्ष के लिए 6.9 फीसदी का अनुमान सेंट्रल स्टैटिस्टिक्स ऑफिस (CSO) के 7 फीसदी के अनुमान से भी कम है। वित्त वर्ष 2017-18 के दौरान भारत की जीडीपी ग्रोथ 7.2 फीसदी रही थी।
तीसरी तिमाही सुस्त पड़ी ग्रोथ
इस बात से अवगत करा दें कि फिच (Fitch Ratings) ने कहा हैं कि भले ही हमने मार्च, 2020 में समाप्त वित्त वर्ष के लिए ग्रोथ अनुमान में कटौती कर दी है। वहीं रेटिंग एजेंसी ने कहा कि अक्टूबर-दिसंबर में लगातार दूसरी तिमाही के दौरान सुस्ती के कारण जीडीपी ग्रोथ में सुस्ती रहेगी, जब 6.6 फीसदी की ग्रोथ रही थी। जबकि इससे पहले जुलाई-सितंबर तिमाही में ग्रोथ 7 फीसदी और अप्रैल-जून में यह आंकड़ा 8 फीसदी रहा था।
मैन्युफैक्चरिंग और एग्रीकल्चर सेक्टर में गिरावट
जानकारी दें कि फिच ने कहा मैन्युफैक्चरिंग और एग्रीकल्चर सेक्टर में सुस्ती की वजह से यह गिरावट देखने को मिल रही है। अर्थव्यवस्था में सुस्ती की मुख्य वजह घरेलू ही रही हैं। वहीं रिपोर्ट के मुताबिक, ऑटो और टूव्हीलर्स जैसे नॉन बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियों (एनबीएफसी) पर निर्भर क्षेत्रों में कर्ज में सख्ती देखने को मिल रही है, जिससे सेल्स में कमी आई है। फूड इनफ्लेशन स्थिर बनी हुई है, जबकि बीते साल यह निगेटिव रही थी। इससे किसानों की आय पर दबाव बढ़ा है।
जीडीपी आप पर कैसे असर डालती
बता दें कि भारत में कृषि, उद्योग और सर्विसेज़ यानी सेवा तीन प्रमुख घटक हैं जिनमें उत्पादन बढ़ने या घटने के औसत के आधार पर जीडीपी दर होती है। ऐसे में अगर देश में तीनों में से किसी भी सेक्टर में ग्रोथ घटती है तो इसका मतलब साफ है कि उससे जुड़े उद्योग संकट में है। लिहाजा नौकरी करने वाले से लेकर सभी पर इसका असर होता है। वहीं, जीडीपी में तेज ग्रोथ आती है तो मतलब साफ है कि नौकरियां बढ़ रही है। लिहाजा लोगों की आमदनी भी तेजी से बढ़ेगी।
GDP इस आधार पर तय होती है
भारत में कृषि, उद्योग और सर्विसेज़ यानी सेवा तीन प्रमुख घटक हैं जिनमें उत्पादन बढ़ने या घटने के औसत के आधार पर जीडीपी दर होती है। ये आंकड़ा देश की आर्थिक तरक्की का संकेत देता है। आसान शब्दों में, अगर जीडीपी का आंकड़ा बढ़ा है तो आर्थिक विकास दर बढ़ी है और अगर ये पिछले तिमाही के मुक़ाबले कम है तो देश की माली हालत में गिरावट का रुख़ है।
GDP दो तरह से पेश होती
जानकारी दें कि जीडीपी को दो तरह से पेश किया जाता है। क्योंकि उत्पादन की लागत महंगाई के साथ घटती-बढ़ती रहती है, यह पैमाना है कॉस्टेंट प्राइस। इसके तहत जीडीपी की दर और उत्पादन का मूल्य एक आधार वर्ष में उत्पादन की कीमत पर तय होता है। मसलन अगर आधार वर्ष 2010 है तो उसके आधार पर ही उत्पादन का मूल्य में बढ़त या गिरावट देखी जाती है। जीडीपी को जिस दूसरे तरीके से पेश किया जाता है वो है करेंट प्राइस। इसके तहत उत्पादन मूल्य में महंगाई दर भी शामिल होती है।


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