Forex Market : बजट के बाद रुपया खुलते ही धड़ाम, 42 पैसे टूटा

Forex Market : बजट 2019 पेश होने के बाद विदेश मुद्रा बाजार में सोमवार को डॉलर के मुकाबले रुपया 42 पैसे कमजोर खुला। कई दिनों बाद डॉलर के मुकाबल रुपया शुरुआत दौर में इतना कमजोर खुला है। आज रुपया 42 पैसे कमजोर होकर 71.66 रुपये के स्तर पर खुला है। वहीं, पिछले कारोबारी दिन यानि शुक्रवार को रुपया 17 पैसे टूटकर 71.24 के स्तर पर बंद हुआ था।

Forex Market

विदेशी मुद्रा बाजार (Forex Market) में पिछले 10 दिनों की चाल

-शुक्रवार को रुपया 17 पैसे टूटकर 71.24 के स्तर पर बंद हुआ था।
-गुरुवार को डॉलर (dollar) के मुकाबले रुपया (Rupee) 8 पैसे बढ़कर 71.08 के स्तर पर बंद हुआ।
-बुधवार को डॉलर (dollar) के मुकाबल रुपया 1 पैसे घटकर 71.12 के स्तर पर बंद हुआ।
-मंगलवार को डॉलर (dollar) के मुकाबले रुपया 1 पैसे की कमजोरी के साथ 71.11 के स्तर पर बंद हुआ।
-सोमवार को रुपया (Rupee) डॉलर के मुकाबले 8 पैसे बढ़कर 71.10 के स्तर पर बंद हुआ है।
-शुक्रवार को रुपया (Rupee) डॉलर (dollar) के मुकाबले 11 पैसे टूटकर 71.18 के स्तर पर बंद हुआ है।
-गुरुवार को रुपया (Rupee) 27 पैसे बढ़कर 71.07 के स्तर पर बंद हुआ।
-बुधवार को रुपया (Rupee) 10 पैसे की बढ़त के साथ 71.34 के स्तर पर बंद हुआ।
-मंगलवार को रुपया (Rupee) 16 पैसे घटकर 71.44 के स्तर पर बंद हुआ।
-रुपया (Rupee) सोमवार को 10 पैसे कमजोर होकर 71.28 के स्तर पर बंद हुआ है।

आजादी के समय रुपये का स्तर

एक जमाना था जब अपना रुपया (Rupee) डॉलर को जबरदस्त टक्कर दिया करता था। जब भारत 1947 में आजाद हुआ तो डॉलर (dollar) और रुपये (Rupee) का दाम बराबर का था। मतलब एक डॉलर बराबर एक रुपया था। तब देश पर कोई कर्ज भी नहीं था। फिर जब 1951 में पहली पंचवर्षीय योजना लागू हुई तो सरकार ने विदेशों से कर्ज लेना शुरू किया और फिर रुपये की साख भी लगातार कम होने लगी। 1975 तक आते-आते तो एक डॉलर की कीमत 8 रुपये (Rupee) हो गई और 1985 में डॉलर (dollar) का भाव हो गया 12 रुपये। 1991 में नरसिम्हा राव के शासनकाल में भारत ने उदारीकरण की राह पकड़ी और रुपया भी धड़ाम गिरने लगा।

डिमांड सप्लाई तय करता है भाव
करेंसी एक्सपर्ट के अनुसार रुपये (Rupee) की कीमत पूरी तरह इसकी डिमांड और सप्लाई पर निर्भर करती है। इंपोर्ट और एक्सपोर्ट का भी इस पर असर पड़ता है। हर देश के पास उस विदेशी मुद्रा का भंडार होता है, जिसमें वो लेन-देन करता है। विदेशी मुद्रा भंडार के घटने और बढ़ने से ही उस देश की मुद्रा की चाल तय होती है। अमरीकी डॉलर (dollar) को वैश्विक करेंसी का रुतबा हासिल है और ज्यादातर देश इंपोर्ट का बिल डॉलर में ही चुकाते हैं।

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