Budget 2019 : जानिए क्या होता है बजट, अंतरिम बजट और वोट ऑन अकाउंट

नई दिल्ली। केन्द्र सरकार वित्त वर्ष 2019-20 के लिए बजट (Budget) पेश करने जा रही है। अब इसमें कुछ ही दिन बचे हैं। लेकिन कुछ शब्दों को लेकर लोग समझ नहीं पा रहे हैं कि यह बजट (Budget) क्या होगा। कुछ लाेग इसे अंतरिम बजट (interim budget) तो कुछ लोग इसे वोट ऑन अकाउंट (vote on account) कह रहे हैं। इसीलिए आइए जानत हैं कि बजट, वोट ऑन अकाउंट और अंतरिम बजट में क्या अंतर होता है।

Budget 2019

तीन तरह के होते हैं बजट
आमतौर पर देश में सरकारें बजट पेश करती हैं। इसे फुल बजट (budget) भी कहा जाता है। इसमें सरकार रह तरह की योजनाओं की घोषणा करती है। वहीं अगर किसी सरकार के कार्यकाल का ज्यादा समय नहीं बचा हो तो उस स्थिति में सरकारें परंपरा के अनुसार आगामी कुछ माह के जरूरी खर्च को चलाने के लिए संसद से अनुमति लेती हैं। बाद में जैसे ही नई सरकार का गठन होता है वह पूरा बजट पेश करती है।

फिर क्या है अंतरिम बजट (interim budget)
परंपरा के अलग हट कर कई बार सरकारों ने वोट ऑन अकाउंट (vote on account) की जगह अंतरिम बजट (interim budget) पेश किया है। अंतरिम बजट में सरकार नई स्कीमों की घोषणा भी कर सकती हैं। यह बजट एक तरह से फुल बजट ही होता है, लेकिन क्योंकि सरकार का कार्यकाल कुछ माह का बचा होता है ऐसी सरकार का पेश बजट अंतरिम बजट कहलाता है।

अंतरिम बजट और आम बजट में अंतर
दोनों ही बजट में सरकारी खर्चों के लिए संसद से मंजूरी ली जाती है, लेकिन अंतरिम बजट (interim budget) आम बजट से अलग हो जाता है। अंतरिम बजट में सामान्यतः सरकार कोई नीतिगत फैसला नहीं करती। हालांकि, इसकी कोई संवैधानिक बाध्यता नहीं है। चुनाव के बाद गठित सरकार ही अपनी नीतियों के मुताबिक फैसले लेती है और योजनाओं की घोषणा करती है। हालांकि, पहले भी कुछ वित्त मंत्री पूर्व टैक्स की दरों में कटौती जैसे नीतिगत फैसले अंतरिम बजट में ले चुके हैं। इस बार वित्त मंत्री अरुण जेटली के अंतरिम बजट (interim budget) से भी ऐसी ही उम्मीदें की जा रही हैं कि इनकम क्लास को टैक्स में कुछ छूट मिल सकती है।

अंतरिम बजट और लेखानुदान में अंतर
जब केंद्र सरकार पूरे साल की बजाय कुछ ही महीनों के लिए संसद से जरूरी खर्च के लिए अनुमति मांगती है तो वह अंतरिम बजट (interim budget) की बजाय वोट ऑन अकाउंट (vote on account) पेश कर सकती है। अंतरिम बजट और वोट ऑन अकाउंट दोनों ही कुछ ही महीनों के लिए होते हैं, लेकिन दोनों के पेश करने के तरीके में अंतर होता है। अंतरिम बजट में केंद्र सरकार खर्च के अलावा राजस्व का भी ब्यौरा देती है, जबकि लेखानुदान में सिर्फ खर्च के लिए संसद से मंजूरी मांगती है।

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