जून तिमाही में सरकारी बैंकों को पिछले साल के मुकाबले 50 गुना से ज्यादा का घाटा हुआ है। इसकी वजह है कर्ज की रकम वापस नहीं होने के कारण होने वाली प्रोविजनिंग लगातार बढ़ते रहना।
जून तिमाही में सरकारी बैंकों को पिछले साल के मुकाबले 50 गुना से ज्यादा का घाटा हुआ है। इकोनॉमिक्स टाइम्स की रिर्पोट के अनुसार इसकी वजह है कर्ज की रकम वापस नहीं होने के कारण होने वाली प्रोविजनिंग लगातार बढ़ते रहना। इस बीच फंसे कर्जों के ताजा संचयन की स्पीड कम पड़ी है क्योंकि लोन डिफॉल्ट के बड़े मामले पहले की तिमाहियों में ही बैंकरप्टसी कोर्ट के हवाले किए जा चुके थे।
21 पब्लिक सेक्टर बैंकों को घाटा
वर्तमान वित्त वर्ष की पहली तिमाही में 21 पब्लिक सेक्टर बैंकों का कुल घाटा बढ़कर 16,600 करोड़ रुपए हो गया, जो सालभर पहले सिर्फ 307 करोड़ रुपए था। इसका पता रेग्युलेटरी फाइनिंग के डाटा से चला है। जून तिमाही में सिर्फ 7 बैंकों ने लाभ दिया है जबकि साल भर पहले ऐसे 12 बैंक थे।
ट्रेडिंग लॉस से बढ़ी है मुसीबत
आपको बता दें कि बॉन्ड प्राइस में उथलपुथल के चलते हुए ट्रेडिंग लॉस से बैंकों की मुसीबत बढ़ी है, लेकिन आर्थिक गतिविधियों में बढ़ोत्तरी के साथ ही प्रमोटरों के रीपेमेंट के बेहतर तौर तरीके अपनाने के चलते बैंकों का डिफॉल्ट लेवल बढ़ने के आसार कम हो गए हैं।
मार्च तिमाही में घाटे में जाने वाले 19 बैंक थे
इसी बीच NPA के लिए सरकारी बैंकों का कुल प्रोविजन सालाना आधार पर 28 प्रतिशत उछाल के साथ 51,500 करोड़ रुपए हो गया है। 31 मार्च को खत्म तिमाही में सरकारी बैंकों का लॉस अब तक के सबसे उुपरी स्तर 62,700 करोड़ रुपए पर पहुंच गया था। उस तिमाही में घाटे में जानेवाले बैंकों की संख्या 19 थी।
तिमाही आधार पर हुआ है सुधार
बैंकों के परफॉर्मेंस में तिमाही आधार पर खासा सुधार आया है, लेकिन एनालिस्ट का कहना है कि क्राइसिस अभी भी खत्म नहीं हुई है। इकोनॉमिक्स टाइम्स की रिर्पोट में आगे बताया गया है कि जहां तक स्लिपेज की बात है तो तिमाही आधार पर हालात में सुधार आया है, लेकिन एब्सॉल्यूट बेसिस पर अब भी उंचा बना हुआ है।


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