सोशल मीडिया की आदत हमें इस कदर लग गई है मानों उसके बिना रह पाना मुश्किल हो गया है। बड़ों के साथ- साथ आजकल छोटे बच्चों को भी सोशल मीडिया की लत लग गई हैं।
सोशल मीडिया की आदत हमें इस कदर लग गई है मानों उसके बिना रह पाना मुश्किल हो गया है। बड़ों के साथ- साथ आजकल छोटे बच्चों को भी सोशल मीडिया की लत लग गई हैं। हम आपको बता दें कि अब गूगल, यूटयूब, फेसबुक, इंस्टाग्राम और स्नैपचैट जैसी सोशल मीडिया साइट्स को बड़ी मुश्किल होगी, अगर सरकार 18 साल से कम उम्र के यूजर्स के डेटा ट्रैकिंग और उनके लिए बनने वाले एड पर अंकुश लगाने की श्रीकृष्ण समिति की सिफारिशें मान लेती है। इंडिया में इन वेबसाइट्स के यूजर्स में बड़ी संख्या किशोरों की है।
कमिटी ने डेटा प्राइवेसी से जुड़े कानून का जो मसौदा दिया है, उसमें गार्जियन फिड्यूसरीज होती हैं जो बच्चों पर फोक्स्ड कमर्शल वेबसाइट या ऑनलाइन सर्विस ऑपरेट करती है या बड़े पैमाने पर बच्चों के पर्सनल डेटा कलेक्ट, प्रोसेस और स्टोर करती हैं।

हम आपको बता दें कि अपनी सुझाव में कमिटी ने कहा कि ऐसी कंपनियों को बच्चों की प्रोफाइलिंग और ट्रैकिंग करने, उनके व्यवहार पर नजर रखने या उनको एड के जरिए टारगेट करने या किसी तरह के पर्सनल डेटा प्रोसेसिंग करने से रोका जाना चाहिए जिससे उन्हें आगे चलकर बड़ा नुकसान हो सकता है। कमिटी की सिफारिश मान लिए जाने पर सोशल मीडिया और टेक दिग्गजों के अलावा, बच्चों को ऑनलाइन कोचिंग सर्विस मुहैया कराने वाली बेंगलुरु की बायजूस जैसी एजुकेशन टेक कंपनियों से लेकर गेमिंग कंपनियों तक को सख्त पाबंदियों का सामना करना पड़ सकता है।
बच्चों और बड़ों के डेटा में फर्क करने की जरूरत इसलिए पड़ी है क्योंकि बच्चों को पता नहीं होता उनके किस काम का क्या नतीजा हो सकता है। कमिटी ने अपनी सिफारिशों में कहा है कि डिजिटल वर्ल्ड में स्थिति और गंभीर हो जाती है जहां डेटा कलेक्शन और प्रोसेसिंग में आमतौर पर कोई पारदर्शिता नहीं होती। हालांकि कुछ वेबसाइट् और ऐप्स 13 साल या उससे ज्यादा उम्र के बच्चों ही को साइन अप करने के देते हैं लेकिन भारतीय कानूनों में कंसेंट के नियम और शर्तों को कोई मान्यता नहीं हैं। इंडियन कॉन्ट्रैक्ट ऐक्ट, 1872 के तहत नाबालिग कोई कॉन्ट्रैक्ट नहीं कर सकता मतलब वे किसी वेबसाइट या ऐप के यूज के लिए अपनी मंजूरी नहीं दे सकते।


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