अर्थशास्त्री मानते हैं कि जीडीपी की ग्रोथ में बढ़ोत्तरी और घटोत्तरी दोनों ही चीजें रोजगार को प्रभावित करती हैं। जीडीपी में धीमी वृद्धि से जॉब पाने के इच्छुक उम्मीदवार और रोजगार सृजन में एक बड़ा अंतर बढ़ता जा रहा है। यह स्थिति चिंताजनक है। इकोनोमिक सर्वे के अनुसार नियोजित क्षेत्र में 31 मार्च 2012 में रोजगार 46.8 मिलियन था। तो वहीं हायरिंग इंडस्ट्री के अनुसार हर साल औपचारिक क्षेत्र में 2 से 3 लाख जॉब के अवसर आते हैं। साथ ही हर साल 12-13 मिलियन नए लोग जॉब सर्च करने मार्केट में आ जाते हैं।
पिछले साल के मुकाबले इस साल GDP
देश की जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) पिछले साल के 7.9% के मुक़ाबले 2017 की जून तिमाही में 5.7% ही रह गई है। जो कि 2% की गिरावट है। यदि जीडीपी ग्रोथ ऐसी ही गिरती रही तो स्थिति और ज़्यादा चिंताजनक हो जाएगी। रुल ऑफ थंब के अनुसार जब जीडीपी की ग्रोथ अच्छी होती है तो रोजगार सृजन ज़्यादा होता है। यह बात सही भी है।
आर्थिक रुप से प्रभावित होता है देश
ऐसा माना जाता है कि जीडीपी में 1 प्रतिशत की ग्रोथ से एक समय में मिलियन जॉब्स पैदा होते हैं। आदित्य बिड़ला ग्रुप के अर्थशास्त्री अजीत रानाडे ने कहा है कि "इसमें कोई संदेह नहीं है कि जीडीपी का रोजगार सृजन और आजीविका से सीधा संबंध है। जीडीपी बढ़ने पर रोजगार बढ़ते हैं और कम होने पर कम। इस बात पर बहस हो सकती है कि इसका कितना प्रभाव पड़ता है, लेकिन 1 प्रतिशत जीडीपी ग्रोथ से कई मिलियन रोजगार पैदा होते हैं क्योंकि साल में 12-13 मिलियन लोग जॉब मार्केट में आते हैं।"
प्लेसमेंट कंपनी की भी बढ़ी मुसीबतें
प्लेसमेंट एजेंसीज का भी यही कहना है। एडिको के कंट्री मैनेजर और एमडी प्रियान्शु सिंह के अनुसार "12-20 साल में हम आईटी और बीपीओ सेक्टर्स में अच्छे जॉब्स उपलब्ध करवा सकते हैं। लेकिन अब एक रुकावट सी पैदा हुई है। अब स्थिति ये है कि हर महीने लगभग 1 मिलियन लोग वर्कफोर्स में शामिल हो रहे हैं। ऐसे में आप इतने लोगों को जॉब्स कैसे देंगे? इस 1 मिलियन की यदि रोजगार सृजन से तुलना की जाये तो एक बड़ा अंतर देखने को मिलेगा।"


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