अगर आप यह सोच रहे हैं कि पांच राज्यों के चुनावों में भाजपा के खाते में वोट बटोरने के चक्कर में केंद्र सरकार 1 फरवरी को बजट पेश कर रही है, तो आप गलत है। इसकी असली वजह कुछ और ही है।
आम तौर पर बजट फरवरी के अंतिम कार्य दिवस को संसद में प्रस्तुत किया जाता रहा है, लेकिन इस बार वित्तीय वर्ष 2017-18 का बजट वित्त मंत्री अरूण जेटली 1 फरवरी को पेश करेंगे। यानी करीब 1 महीने पहले। कई लोग सोच रहे हैं कि यह चुनावी स्टंट है। जबकि सच पूछिए तो 27 दिन पहले बजट आने से देश को बड़ा फायदा हो सकता है। असल में इससे सरकार को प्रमुख आयात उद्देश्यों को प्राप्त करने में मदद मिलेगी।

केन्द्र सरकार ने वर्ष 2016-17 के बजट में व्यय के मद में 20 लाख करोड़ रुपये के करीब खर्च करने का प्रावधान किया। वित्तीय वर्ष 2017-18 के लिए केन्द्रीय वित्त मंत्री अरूण जेटली ने कुल व्यय 22 लाख 23 लाख करोड़ रूपये के बीच रखा है। यह मौजूदा कीमतों पर सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 14 प्रतिशत है। इतनी बड़ी रकम को खर्च करने में कितना समय लगता है, इसका अंदाजा हर किसी को नहीं होता।
कुछ खास बातें निर्धारित बजट को खर्च करने के संबंध में
- बजट सत्र दो चरणों में संपन्न होता है: पहले चरण में सरकार को निर्बाध गति से कामकाज करने के लिए लेखानुदान प्राप्त किया जाता है, जबकि बजट सत्र के दूसरे चरण मई में बजट को संसद से पूर्ण मान्यता मिलती है।
- वित्त मंत्री के बजट भाषण में कर और गैर-कर प्रस्तावों को बजट पेश करते समय ही सरकार की प्रमुख नीति तथा दशा एवं दिशा को दर्शाता है।
- भाषण की समाप्ति के बाद इस पर बहस होती है। बहस के बाद ही बजट प्रस्तावों में सुधार की सिफारिश की जाती है।
- समय से पूर्व कम-से-कम पहली तिमाही के लिए अंतिम परिव्यय उपलब्ध हो जाता है।
- दूसरी तिमाही में संबंधित विभाग और मंत्रालय बजट में घोषित परियोजनाओं और कार्यक्रमों को लागू करने पर काम शुरू कर देते हैं जो सरकार के लिए प्रमुख होता है।
- सरकारी धन को निजी व्यवसाय की तरह खर्च नहीं किया जा सकता है।
- संसदीय समितियों के अलावा भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) और इस जैसी अन्य एजेंसियों जैसे केंद्रीय सतर्कता आयोग द्वारा समीक्षा की जाती है।
कहां होती है देरी
नौकरशाहों को कार्यक्रमों और नीतियों के कार्यान्वयन में सावधानी बरतने के कारण थोड़ा विलम्ब होता है। निविदा जारी करने, सौदों को अंतिम रूप देने इत्यादि की पूरी प्रक्रिया में कुछ महीने लग सकते हैं, जिससे ज्यादातर मामलों में संबंधित विभाग को ठेकेदार को आदेश निर्गत करने में तीसरी तिमाही के मध्य या अंत तक का समय लग जाता है। जिससे पैसा अंतिम तिमाही में या कभी-कभी तो 31 मार्च तक ही व्यय हो पाता है।
तो आप समझ गये होंगे कि जो बजट भाषाण के दौरान जो-जो घोषणाएं होंगी, उनके क्रियान्वयन में कितना समय लगेगा। यानी कि आप यह नहीं तय कर सकते कि आज सरकार ने कहा और कल कर दिया। स्वाभाविक रूप से दवाब संबंधित ठेकेदार के साथ-साथ विभाग या मंत्रालय पर भी आ जाता है जिससे उस काम की गुणवत्ता भी प्रभावित होती है।
इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखकर सरकार ने बजट को पहले पेश करने का मन बनाया और उसे इस वर्ष से मूर्त रूप भी देने जा रही है। सरकार के इस कार्य से बजट पर लोकसभा एवं राज्यसभा में चर्चा के लिए पर्याप्त समय भी मिलेगा तथा संबंधित मंत्रालयों एवं विभागों को परियोजनाओं को कार्यान्वित करने की शुरूआत करने में भी सुविधा होगी। इसमें सरकार की मंशा स्पष्ट है कि उसे कार्यों को शुरू करने से लेकर खत्म करने तक में समय की कमी नहीं होगी और सरकार भी उन्नति के पथ पर अग्रसर रहेगी।
लखक परिचय: लेखक नई दिल्ली स्थित वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार हैं जो मुख्यत: सामाजिक-आर्थिक मुद्दों पर लिखते हैं।
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