आरबीआई ने निजी बैंकों में प्रमोटरों की हिस्सेदारी की सीमा बढ़ाने का सुझाव दिया है।
नई दिल्ली: आरबीआई ने निजी बैंकों में प्रमोटरों की हिस्सेदारी की सीमा बढ़ाने का सुझाव दिया है। भारतीय रिजर्व बैंक (आईबीआई) ने भारतीय निजी क्षेत्र के बैंकों के लिए वर्तमान स्वामित्व दिशानिर्देशों और कॉर्पोरेट संरचना की समीक्षा करने के लिए 12 जून, 2020 को एक आंतरिक कार्य समूह (आईडब्लूजी) का गठन किया था। जिसमें आईडब्ल्यूजी ने अपनी रिपोर्ट सौंप दी है। रिपोर्ट में इस बात की सिफारिश की गई है कि प्रमोटरों की हिस्सेदारी पर मौजूदा कैप को 15% से बढ़ाकर 26% किया जा सकता है। वहीं गैर-प्रवर्तक पर 15% तक कैप बढ़ाने की भी सिफारिश की है ताकि सभी प्रकार के शेयरधारकों के बीच एकरूपता लाई जा सके।

ग्रुप ने साथ ही सिफारिश की है कि बड़ी कंपनियों या इंडस्ट्रियल हाउसेस को बैंकिंग रेग्युलेशन एक्ट में संशोधन के बाद बैंकों में प्रमोटर के तौर पर शामिल होने की अनुमति दी जा सकती है। साथ ही उन पर नजर रखने की व्यवस्था को मजबूत किया जाना चाहिए। केंद्रीय बैंक ने इस साल 12 जून को इस ग्रुप का गठन किया था। इसे निजी क्षेत्र के बैंकों के कॉरपोरेट स्ट्रक्चर और ओनरशिप गाइडलाइंस की समीक्षा करने की जिम्मेदारी दी गई थी। आरबीआई ने शुक्रवार को इस ग्रुप की रिपोर्ट जारी की। पैनल ने 50 हजार करोड़ रुपये और इससे अधिक एसेट साइज वाली बड़ी एनबीएफसी को बैंक में बदलने पर विचार करने का भी सुझाव दिया है, बशर्ते उन्होंने 10 साल पूरे कर लिए हों।
न्यूनतम राशि 500 से बढ़ाकर की जाए 1000 करोड़
पैनल ने नए बैंकों को लाइसेंस देने के लिए न्यूनतम शुरुआती पूंजी को यूनिवर्सल बैंकों के लिए 500 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 1000 करोड़ रुपये करने और स्मॉल फाइनेंस बैंकों के लिए 200 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 300 करोड़ रुपये करने की सिफारिश की है। पैनल ने निजी बैंकों के कामकाज में सुधार के लिए भी कई सिफारिशें की हैं।


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