MSME : इलेक्ट्रिक चाक से बढ़िया चल रहा पुराने जमाने का बिजनेस, कमाई भी शानदार

नयी दिल्ली। भारत में कोरोना संकट ने छोटे-बड़े सभी उद्योगों की कमर तोड़ कर रख दी थी। मगर अब हालात धीरे-धीरे सुधर रहे हैं। फिर भी ऐसे बहुत से लोग हैं जिनके पास नौकरी या अपना कारोबार नहीं है। अगर आप अपना छोटा-मोटा कारोबार शुरू करना चाहते हैं तो एक आइडिया हम आपको सुझा सकते हैं। भारत में मिट्टी के बर्तनों का कारोबार बहुत पुराना है। अब सरकार इस कारोबार को बढ़ावा दे रही है। पारंपरिक हस्तशिल्प इंडस्ट्री भारत की एक पहचान रही है। मिट्टी से बनी चीजें इसी में शामिल हैं। सरकार ने इस छोटे उद्योग को आगे बढ़ाने के लिए लोगों को इलेक्ट्रिक चाक बांटे हैं। ये छोटा सा कारोबार बेहद कम पैसों में शुरू किया जा सकता है।

नए जमाने में पुराना कारोबार

नए जमाने में पुराना कारोबार

सुनने में ये कारोबार पुराने समय का लगता है मगर इलेक्ट्रिक चाक की मदद से सरकार इसे आगे ले जाना चाहती है। असल में मोदी सरकार ने स्वरोजगार पर काफी ध्यान दिया है। छोटे कारोबारियों को सरकार लोन भी देती। अपना कारोबार शुरू करने के लिए सरकार युवाओं को भी प्रोत्साहित करती है। इसी के तहत आत्मनिर्भर भारत अभियान की भी शुरुआत की गई। जहां तक मिट्टी से चीजें तैयार करने का सवाल है तो गांव गोहली (बिजनौर, यूपी) के एक शख्स ने मोहन प्रजापति ने इसकी मिसाल कायम की है।

ऐसे कमा रहे पैसा

ऐसे कमा रहे पैसा

आज के नई-नई मशीनों वाले जमाने में मोहन ने खुद इलेक्ट्रिक चाक तैयार किया है। हालांकि बता दें कि सरकार ने भी ऐसे चाक इच्छुक लोगों को दिए है। मोहन ने इस चाक से अपने कारोबार का काफी बढ़ा लिया है। इतना ही नहीं वे खुद से तैयार किए इस चाक को बेच कर भी पैसा कमा रहे हैं। उन्होंने चाक में एक मोटर फिट की है। उनके अनुसार इस बिजली से चलने वाले चाक से मिट्टी के बर्तन काफी आसानी से तैयार होते हैं। इतना ही नहीं आप सिर्फ 1 घंटे में बाकी बर्तनों के साथ 200 कुल्हड़ बना सकते हैं। इससे आपको अच्छा पैसा मिलेगा।

और लोग भी हो रहे प्रेरित

और लोग भी हो रहे प्रेरित

मोहन के अनुसार उनका चाक इस तरह तैयार किया गया है इससे करंट लगने की टेंशन नहीं है। यानी ये सुरक्षित है। दिवाली आने वाली है और ऐसे मौकों पर मिट्टी के दीयों की बिक्री काफी होती है, जिससे चाक की मांग बढ़ जाती है। मोहन अपने बिजनेस को आगे बढ़ाने के साथ-साथ और लोगों को भी प्रेरित कर रहे हैं। मोहन खुद पढ़े-लिखे नहीं हैं, मगर वे अपने बच्चों को पढ़ा रहे हैं।

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