नई दिल्ली, सितंबर 19। देश भर में बेरोज़गारी एक बड़ी समस्या की तरह है। खास कर कोरोना आने के बाद हालात अच्छे नहीं हैं। खास कर युवा इस समस्या से जूझ रहे हैं। युवकों में नौकरी छोड़ने का भी ट्रेंड देखा जा रहा है। असल में युवा नौकरी के बजाय खुद बन बॉस कर बिजनेस करने पर फोकस कर रहे हैं। नौकरी छोड़ कर व्यापार की तरफ जाना एक रिस्की काम तो है, मगर यदि सफलता मिल जाए तो हर महीने लाखों रुपये की कमाई की जा सकती है। यहां हम आपको एक ऐसी ही युवा की कहानी बताने जा रहे हैं, जिसने रिस्क लेकर नौकरी छोड़ी और एक बिजनेस शुरू किया और अब वे हर महीने लाखों रु कमा रहे हैं।
कितनी है कमाई
ये कहानी है रांची, झारखंड के निशांत कुमार की, जो नौकरी छोड़ कर बिजनेस में उतरे और हर महीने अब वे 11 लाख रुपये की कमाई कर रहे हैं। निशांत ने नौकरी छोड़ कर मछली पालन के बिजनेस में एंट्री मारी। इससे उनकी ज़िंदगी हमेशा के लिए बदल गई। इस बिजनेस से वे आत्मनिर्भर बने। अब वे दूसरे लोगों को भी रोज़गार दे रहे हैं।
एमबीए मछली वाले के नाम से हुए मशहूर
वो साल 2018 था, जब निशांत कुमार ने मछली पालन बिजनेस शुरू किया। वे इस बिजनेस की शुरुआत के बाद एमबीए चाय वाला की तरह एमबीए मछली वाला के नाम से मशहूर हो गए। करीब 11 लाख रुपये निशांत हर महीने कमाते हैं। वह बड़े पैमाने पर मछली पालन कर रहे हैं। वे ये बायोफ्लॉक, जलाशय, पेन और पॉन्ड कल्चर के ज़रिए कर पा रहे हैं।
इंडोनेशिया से सीखी तकनीक
निशांत दूसरे लोगों को भी मछली पालन की जानकारी दे रहे हैं और उन्हें मछली पालन के बिजनेस में उतरने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। निशांत ने मछली पालन की तकनीक इंडोनेशिया से सीखी। इसी की मदद से अब वे कई तरीक़े से मछलियां पालने में सक्षम हैं। निशांत के अनुसार मछली पालने के लिए तालाब ही हो ऐसा ज़रूरी नहीं है। कई अन्य तरीकों से मछली पालन संभव है।
आर्टिफिशियल टंकी में भी मछली पालन
निशांत कहते हैं कि आर्टिफिशियल टंकी में भी मछली पालन संभव है। यह आर्टिफिशियल तालाब भी कहलाता है। इस सिस्टम को बायोफ्लॉक नाम दिया गया है। इसमें एक आर्टिफिशियल टंकी (तालाब) होता है, जिसमें 15 हजार लीटर पानी होता है और उसमें करीब 300 किलो मछली होती है।
कई प्रजाति की मछलियों का पालन
आर्टिफिशियल तलाब में कई प्रजाति की मछलियों का पालन किया जा सकता है। इनमें मोनोसेक्स तेलापिया, पंगास, वियतनामी कोई, कतला, मृगल कार्प, रोहू, सिल्वर ग्रास कार्प, गोल्डन कार्प और देसी मांगुर के अलावा और भी प्रजाति की मछलियां शामिल हैं। एक बायोफ्लॉक में मछलियों के पालने का खर्च 1500 रुपये प्रति महीने तक आ सकता है। तीन महीने में मछली बाजारों इस लायक हो जाती है कि उनकी सप्लाई की जा सके। इस समय निशांत प्रति दिन करीब 36000 रुपये की मछली बाज़ारों में पहुंचा रहे हैं। निशांत के ज़रिए 7 लोगों को रोज़गार मिला। वहीं 40 और लोगों को उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार दिलाने में मदद की। आप इस काम को शुरू करते हैं तो आपको सरकार की तरफ से सब्सिडी मिल सकती है।
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