सरकार की ओर से तीन लाख करोड़ रुपये का पैकेज जारी करने के बावजूद एमएसएमई की हालत ठीक नहीं है। अर्थव्यवस्था के हालात नाजुक हैं।
नई दिल्ली: सरकार की ओर से तीन लाख करोड़ रुपये का पैकेज जारी करने के बावजूद एमएसएमई की हालत ठीक नहीं है। अर्थव्यवस्था के हालात नाजुक हैं। कोविड-19 और लॉकडाउन ने कारोबार को भारी नुकसान पहुंचाया है। तमाम सेक्टर के छोटे उद्यमों (एमएसएमई) पर भी इसका असर पड़ेगा। इस बात की जानकारी क्रिसिल रिसर्च ने अपनी रिपोर्ट में दी हैं। उसका कहना है कि इस संकट से जहां उद्योग जगत के रेवेन्यू में 15 फीसदी और मार्जिन में 25 फीसदी की गिरावट आ सकती है। वहीं, छोटे उद्योगों को यह तबाह कर सकता है। क्रिसिल रिसर्च ने कहा कि एमएसएमई के लिए रेवेन्यू में यह कमी 17-21 फीसदी रहने का अनुमान है। जबकि प्रॉफिट मार्जिन 4-5 फीसदी तक सीमित रहेगा।

नकदी की कमी के चलते इनकी साख पर भी असर पड़ सकता है. खास तौर से कार्यशील पूंजी (वर्किंग कैपिटल) के मोर्चे पर समस्याएं पैदा हो सकती हैं। सूक्ष्म उद्यमों के लिए चुनौतियां सबसे कठिन होंगी, जो समग्र एमएसएमई ऋण का 32% हिस्सा हैं और राजस्व वृद्धि, परिचालन लाभ मार्जिन और कामकाजी पूंजी खिंचाव के मामले में सामग्री तनाव का सामना कर रहा है। जबकि पिछले मंदी ने दिखाया है कि सूक्ष्म और छोटे उद्यम क्षणिक कार्यशील पूंजी की चुनौतियों का प्रबंधन करने में असमर्थ रहे, जबकि बड़े और मध्यम उद्यमों ने इससे आसानी से उभर सके।
फिलहाल स्टार्टअप के पास फंड नहीं
कोविड-19 की वजह से अर्थव्यवस्था को लगे झटके से स्टार्टअप का संकट बढ़ गया है। लॉकडाउन की वजह से कारोबार बंद होने से 38 फीसदी स्टार्ट-अप के पास पूंजी नहीं है। जबकि चार फीसदी फंड के अभाव में बंद हो गए हैं। 30 फीसदी के पास सिर्फ दो से तीन महीने का कैश बचा है। लोकल सर्किल के एक सर्वे में कहा गया है कि 16 फीसदी स्टार्टअप के पास सिर्फ तीन से छह महीने की पूंजी बची है। 12 फीसदी के पास एक महीने से कम का कैश बचा है। चार फीसदी का कहना है कि लॉकडाउन के कारण वे पहले ही अपना कारोबार बंद कर चुके हैं। जहां तक एमएसएमई का सवाल है कि उन्हें घाटा हुआ तो रोजगार पर काफी असर होगा। देश में इस वक्त छह करोड़ एमएसएमई हैं और इनमें लगभग 11 करोड़ लोगों को रोजगार मिला हुआ है।


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