नई दिल्ली, मार्च 8। केरल के पलक्कड़ के एलापुल्ली गांव में मारुति गार्डन में सुनहरे धान के खेत, फलों के बाग और सब्जियों के खेत हैं। 24 एकड़ भूमि में फैली यह एक अद्भुत भूमि है। यह जैविक खेत या ऑर्गेनिक फार्म हैं। मगर यह जमीन हमेशा से ऐसी नहीं थी। बल्कि जमीन का यह हिस्सा बंजर था। पर 62 वर्षीय पी भुवनेश्वरी ने दशकों मेहनत की और नतीजे में बंजर जमीन को शानदार जैविक खेत बना दिया। भुवनेश्वरी ने गृहिणी से जैविक किसान बनने तक का सफर तय किया है। मेहनत के दम पर उनकी कमाई भी काफी तगड़ी है।
कैसे हुई शुरुआत
भुवनेश्वरी का किसान बनने का सफर 1990 के दशक में शुरू हुआ। उन्होंने 4 एकड़ बंजर भूमि के साथ खेती की शुरुआत की थी। इस जमीन को लेकर भुवनेश्वरी को यकीन था कि एक दिन ये फले-फूलेगी। उन्होंने इसके लिए बहुत मेहनत की और बंजर क्षेत्र को एक हरे-भरे खेत में बदलने के लिए कड़ी मेहनत की। उन्होंने अपनी जमीन का विस्तार किया और उनके पास आज 24 एकड़ जमीन है।
कहां तक की शिक्षा हासिल
भुवनेश्वरी ने 10वीं कक्षा तक स्कूल में पढ़ाई की है। उनके अनुसार सूखी जमीन उपजाऊ थी। पर ये पत्थरों से ढकी हुई थी। मौजूदा स्थिति में लाने के लिए उन्हें बहुत प्रयास करना पड़ा। कुछ भूमि को भुवनेश्वरी ने साफ किया, जहां पत्थर नहीं थे और फिर वहीं से खेती की शुरुआत की। अहम बात यह है कि उन्होंने कभी भी कीटनाशकों या रासायनिक उर्वरकों का उपयोग नहीं किया। उन्होंने हमेशा प्राकृतिक जैविक खेती की।
पारंपरिक कृषि परिवार में जन्म
पारंपरिक कृषि घराने में जन्मी और पली-बढ़ी भुवनेश्वरी खेती को ही अपनी शिक्षा का आधार मानती हैं। कृषि जागरण की रिपोर्ट के अनुसार वे कहती हैं कि अपने पिता को फॉलो करते हुए उन्होंने खेती सीखी। उनके पिता भी हमेशा कृषि के प्रति उत्साही रहे। यानी खेती के लिए प्रेम उन्हें पिता से विरासत में मिला। इसी ने उन्हें खेती के क्षेत्र में उतरने के लिए प्रोत्साहित किया।
18 लाख रु है कमाई
बताते चलें कि भुवनेश्वरी 10 एकड़ जमीन पर टिकाऊ और प्राकृतिक तरीकों से धान की खेती कर रही है। वे इस जमीन पर जैविक खाद और हरी पत्तियों के इस्तेमाल से 25 क्विंटल तक उत्पादन कर सकती हैं। वे बताती हैं कि उन्होंने केवल 2 लाख रुपये के शुरुआती खर्च के बाद अकेले चावल और चावल उत्पादों से लगभग 18 लाख रुपये का लाभ कमाया है।
वर्कशॉप में सीखी जरूरी चीजें
भुवनेश्वरी ने प्राकृतिक जैविक खेती के जानकार सुभाष पालेकर के नेतृत्व में एक वर्कशॉप भी अटेंड की। उन्होंने वहां रसायन मुक्त खेती के बारे में सीखा और इसे आजमाने का फैसला किया। उन्होंने सीखा कि कैसे प्राकृतिक खाद का उपयोग करके भूमि को उपजाऊ बनाया जाता है। फिर उन्होंने जीवामृतम और पंचगव्यम जैसे प्राकृतिक उर्वरकों को तैयार करना शुरू किया, जो ज्यादातर गाय के गोबर और गोमूत्र से बने होते हैं। इससे वास्तव में मिट्टी की गुणवत्ता बढ़ाने और फसल की वृद्धि को बढ़ावा देने में मदद मिली। मिट्टी को पूरी तरह से बदलने में उन्हें पांच साल लग गए। तब तक वे गायों पर निर्भर रहीं और उनका दूध बेचकर कमाई की।
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