RBI MPC Meeting: रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) आज सुबह 10 बजे बड़ा ऐलान कर सकती है. 5 जून से जारी मौद्रिक समीक्षा कमिटी (MPC) की मीटिंग का निर्णय 7 तारीख को होना है. 6 सदस्यों वाली इस कमिटी में ब्याज दरों, महंगाई, आर्थिक ग्रोथ को लेकर मीटिंग हुई. कमिटी के अध्यक्ष गवर्नर शक्तिकांत दास आज सुबह फैसले की जानकारी देंगे. इसमें खासकर फोकस रेपो रेट पर होगी, जिससे लोन लेने वालों के लिए राहत की खबर आ सकती है. क्योंकि रेपो रेट और रिवर्स रेपो रेट में बदलाव का असर लोन EMI पर पड़ती है. बता दें कि मौजूदा रेपो रेट 6.50% है.
ECB और कनाडा ने दरें घटाई
वहीं, सितंबर 2019 के बाद पहली बार यूरोपीय सेंट्रल बैंक ने ब्याज दरों में कटौती कर दी है. इसके तहत 25 बेसिस पॉइंट्स की कटौती की गई है. इससे पहले बैंक ऑफ कनाडा ने भी दरों में कटौती किया. इसके तहत दरें घटकर 4.75 फीसदी पर आ गई हैं. सेंट्रल बैंक ने मार्च 2020 के बाद का पहली दरों में कटौती की है.
महंगाई घटाने पर हो सकता है फोकस
रिजर्व बैंक का फोकस इस बार की पॉलिसी मीटिंग में महंगाई को घटाने पर हो सकता है. ताजा आंकड़ों के मुताबिक रिटेल महंगाई दर अप्रैल में 4.8% रही, जोकि RBI के टारगेट 4% से ऊपर है. हालांकि, ये रिजर्व बैंक के दायरे में है. ऐसे में पॉलिसी मीटिंग में रेपो रेट के स्थिर रखा जा सकता है. क्योंकि आर्थिक ग्रोथ की रफ्तार अच्छी रहने से सपोर्ट मिल सकता है. FY24 में GDP ग्रोथ रेट 8.2% रही थी.

हर दो महीने में होने वाली मॉनेटरी पॉलिसी की मीटिंग इस बार 5 से 7 जून होता है. इससे पहले फरवरी में पॉलिसी मीटिंग में रेपो रेट में बदलाव किया गया था. उसके बाद अप्रैल में दरों को स्थिर रखने का फैसला किया गया. FY23 में 6 बार पॉलिसी मीटिंग हुई थी.
RBI क्यों घटता या बढ़ता है रेपो रेट?
बढ़ते जियो-पॉलिटिकल टेंशन के चलते दुनियाभर के सेंट्रल बैंक ने महंगाई पर काबू पाने के लिए दरों में इजाफा किया. इसमें भारत का केंद्रीय बैंक यानी RBI भी शामिल है. सेंट्रल बैंक के पास रेपो रेट के रूप में महंगाई से लड़ने का एक मजबूत हथियार है. ऐसे में जब भी महंगाई काबू से बाहर निकल जाती है या फिर निकलने लगती है तब RBI रेपो रेट में बदलाव करता है.
इससे अर्थव्यस्था में लिक्विडिटी फ्लो को कम करने की कोशिश की जाती है. यानी रेपो रेट हाई होगा तो बैंकों को RBI से मिलने वाला लोन महंगा मिलेगा. इसके चलते बैंक ग्राहकों को ज्यादा ब्याज दरों पर लोन बांटेंगे. नतीजनत, इकोनॉमी में लिक्विटी का फ्लो गिर जाएगा. और जब मनी फ्लो गिरेगा तो महंगाई घट जाएगी.
इसके ठीक उलट जब इकोनॉमी में लिक्विडिटी का फ्लो बढ़ाना होता है तब रिजर्व बैंक रेपो रेट को कम कर देती है. रेपो रेट कम होने से बैंकों को कम ब्याज पर RBI से लोन मिलता है. इससे ग्राहकों को भी लोन ब्याज दरों पर सस्ते में मिलता है. नतीजनत, इकोनॉमी की रफ्तार को जोश मिलता है. इसे उदाहरण से समझते हैं....कोरोना महामारी के समय आर्थिक संकट में रिजर्व बैंक ने रेपो रेट घटाकर आर्थिक ग्रोथ में जोश भरने का काम किया.
रिवर्स रेपो रेट में बदलाव से कितना पड़ता है असर?
MPC पॉलिसी में रेपो रेट के साथ रिवर्स रेपो रेट का भी ऐलान किया जाता है. रिवर्स रेपो रेट उसे कहते है जिस रेट पर रिजर्व बैंक बैंकों को पैसा रखने पर ब्याज देता है. रिवर्स रेपो रेट में बढ़ोतरी कर RBI बाजार में नकदी को कम करता है. वहीं, बैंक RBI के पास अपनी होल्डिंग के लिए ब्याज लेकर इसका फायदा उठाते हैं. सेंट्रल बैंक इकोनॉमी में महंगाई बढ़ने के दौरान रिवर्स रेपो रेट बढ़ाता है, जिससे बैंकों के पास ग्राहकों को लोन देने के लिए फंड कम हो जाता है.


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