चाइनीज बैंक का एचडीएफसी में हिस्सा खरीदना क्या है वाकई बड़ी डील, जानिए यहां

नयी दिल्ली। चीन के पीपल्स बैंक ऑफ चाइना ने एचडीएफसी में 1 फीसदी से ज्यादा हिस्सेदारी खरीद ली है। मगर इस सौदे पर सवाल उठने लगे हैं। धीरे-धीरे निवेशक, विश्लेषक और यहां तक कि राजनेता भी अब इस मामले में सवाल उठाने लगे हैं। हालांकि विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक हमेशा भारतीय कंपनियों में, विशेष रूप से फाइनेंशियल कंपनियों, में बड़ी रकम का निवेश करते रहे हैं। मगर यहां सवाल है किसी विदेशी सरकार की स्वामित्व वाली कंपनी का भारतीय कंपनी में पैसा लगाने का। जैसा कि चीन के केंद्रीय बैंक का मामला सामने आया है। हालांकि अन्य देशों के सरकारी स्वामित्व वाली कंपनियों को हमेशा विदेशी संस्थागत निवेशकों के रूप में मान्यता दी गई है और वे भारतीय बैंकों और संस्थानों में हिस्सेदारी के मालिक हैं। इसका सबसे महत्वूर्ण उदाहरण है आईसीआईसीआई बैंक, जिसमें दूसरा सबसे बड़ा विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक सिंगापुर की सरकार है। सिंगापुर सरकार की आईसीआईसीआई बैंक में 2 फीसदी से अधिक हिस्सेदारी है।

इन विदेशी सरकारों का लगा है आईसीआईसीआई बैंक में पैसा

इन विदेशी सरकारों का लगा है आईसीआईसीआई बैंक में पैसा

- Dodge and Cox International Stock Fund (अमेरिका) : 4.11 फीसदी
- सिंगापुर सरकार : 2.09 फीसदी
- अबूधाबी इन्वेस्टमेंट अथॉरिटी : 1.07 फीसदी

इसी तरह एचडीएफसी और एचडीएफसी बैंक का मामला है। इन बैंक और कंपनी, खास कर एचडीएफसी, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की पसंदीदा रही है। वहीं एचडीएफसी बैंक में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की 37.92 फीसदी हिस्सेदारी है। इनमें यूरो पैसिफिक ग्रोथ फंड की 4.76 फीसदी और सिंगापुर सरकार की 1.27 फीसदी हिस्सेदारी है।
चाइनीज सेंट्रल बैंक पर सवाल उठाना कैसा

चाइनीज सेंट्रल बैंक पर सवाल उठाना कैसा

यदि दूसरे सोवरेन वेल्थ फंड्स भारतीय बैंक और संस्थानों में हिस्सेदारी खरीद सकते हैं तो यही नियम पीपल्स बैंक ऑफ चाइना के लिए भी लागू होना चाहिए। वैसे भी 31 दिसंबर 2019 तक के आंकड़ों के मुताबिक एचडीएफसी में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की 72 फीसदी हिस्सेदारी है। ऐसे में पीपल्स बैंक ऑफ चाइना का 1 फीसदी हिस्सेदारी खरीदना कोई बड़ी बात नहीं है। दूसरी बात यह भी है कि जिस तरह से एचडीएफसी के शेयर में गिरावट आई है तो इसमें निवेश करना एक समझ में आने वाली बात है।
आम तौर पर एचडीएफसी जैसे मामले को तूल देने की जरूरत नहीं। लेकिन एक प्रमुख ब्लूचिप कमर्शियल संस्थान में हिस्सेदारी खरीदने वाला किसी देश का केंद्रीय बैंक हो तो ये असामान्य है। इसीलिए इस मामले को लेकर खलबली मची है। इसकी वजह ये भी हो सकती है कि यहां एक अलार्म बजाया गया है क्योंकि चाइनीज बैंक एचडीएफसी में हिस्सेदारी धीरे-धीरे बढ़ा रहा था।

एफपीआई निवेश को कौन कंट्रोल करता है?

एफपीआई निवेश को कौन कंट्रोल करता है?

विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक एफपीआई, अनिवासी भारतीय (एनआरआई), और भारतीय मूल के व्यक्ति (पीआईओ) को पोर्टफोलियो निवेश योजना (पीआईएस) के माध्यम से भारत में प्राथमिक और द्वितीयक पूंजी बाजार में निवेश करने की अनुमति है। भारतीय रिज़र्व बैंक दैनिक आधार पर इनकी शेयरहोल्डिंग पैटर्न की निगरानी करता है। पोर्टफोलियो निवेश योजना के तहत, एफपीआई / एनआरआई भारत में स्टॉक एक्सचेंजों के माध्यम से भारतीय कंपनियों के शेयरों / डिबेंचर खरीद सकते हैं।
एफपीआई निवेश की सीमा को सेक्टोरल कैप / वैधानिक सीमा तक बढ़ाया जा सकता है, जो बोर्ड की मंजूरी और एक विशेष प्रस्ताव पारित करने वाली कंपनी की जनरल बॉडी के अधीन है। एनआरआई / पीआईओ के लिए निवेश की 10 प्रतिशत की सीमा को 24 प्रतिशत तक बढ़ाया जा सकता है, यदि इसके लिए कंपनी की जनरल बॉडी मंजूरी दे तो। अगर ये सीमा पार की जाती है तो आरबीआई फौरन रिलीज जारी करता है कि निवेश की सीमा पार कर दी गई है।

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