नयी दिल्ली। राजकोषीय घाटा एक ऐसा शब्द है जो आपके सामने बहुत बार आया होगा। कुछ ही दिनों में बजट पेश किया जाने वाला है ऐसे में इस शब्द को आप खबरों में बार-बार देख और सुन रहे होंगे। मगर क्या आप इसका मतलब जानते हैं? आपको इस शब्द का अर्थ और इसके पीछे का सारा गणित जरूर पता होना चाहिए। न सिर्फ इसलिए कि आपकी जानकारी में इजाफा होगा, बल्कि राजकोषीय घाटा आपको भी किस तरह प्रभावित करता है इसलिए इसके बारे में जानना जरूरी है। दरअसल वित्त मंत्री द्वारा लिये जाने वाले फैसले हमारे रोज के जीवन को प्रभावित करते हैं ऐसे में इस तरह की काम की जानकारी रखना आपके लिए बेहद जरूरी है। आइये समझते हैं राजकोषीय घाटे का मतलब।
क्या है राजकोषीय घाटा
राजकोषीय घाटा यानी फिस्कल डेफिसिट। इसमें डेफिसिट शब्द सरप्लस का एक दम उलट है। जब सरकार अपनी आय से अधिक खर्च करती है तो उस अधिक खर्च को राजकोषीय घाटा कहते हैं। अगर सरकार खर्च से अधिक आय प्राप्त करे तो उस सरप्लस यानी फायदा माना जायेगा। सरकार मुख्य रूप से टैक्स और अपने व्यवसायों से हासिल करती है। मगर इस आमदनी में सरकार द्वारा लिया गया उधार शामिल नहीं किया जाता।
क्या हैं राजकोषीय घाटे के कारण
जैसा कि बताया गया है सरकार का खर्च आमदनी से अधिक होना राजकोषीय घाटे का सबसे बड़ा कारण है। यह तब भी हो सकता है जब इन्फ्रास्ट्रक्चर जैसी लंबी अवधि की संपत्ति बनाने के लिए सरकार कोई बड़ा पूंजीगत व्यय करे। डेफिसिट होने पर देश अपने केंद्रीय बैंक (भारत में आरबीआई) से उधार ले सकता है या ट्रेजरी बॉन्ड और बिल जारी करके पूंजी बाजार के माध्यम से धन जुटा सकता है।
क्या है अर्थशास्त्रियों की राय
कुछ अर्थशास्त्रियों का मानना है कि राजकोषीय घाटे का सकारात्मक असर भी हो सकता है, खासकर तब जब ज्यादा खर्च सुधारों या मंदी को समाप्त करने के लिए किया गया हो। उच्च बेरोजगारी दर के मामले में, सरकारी खर्चों में वृद्धि से व्यापार के लिए एक बाजार तैयार होता है, जिससे आय और उपभोक्ता खर्च में वृद्धि होगी। नतीजे में व्यापार उत्पादन बढ़ेगा। व्यापार उत्पादन में वृद्धि से सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में वृद्धि होती है।
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