What is Fiscal Deficit: फिस्कल डेफिसिट (Fiscal Deficit) हर बजट का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। हर बजट में सरकार की ओर से इसका एक टारगेट सेट किया जाता है। बजट में कई ऐसी शब्द होते हैं, जो पूरी अर्थव्यवस्था पर असर डालते हैं। बजट अंतरिम हो या पूर्ण हर बार सरकार की ओर से फिस्कल डेफिसिट की चर्चा जरूर की जाती है। आइए इसके बारे में आपको आसान भाषा में बताते हैं।

सरल भाषा में समझें आखिर क्या है फिक्सल डेफिसिट?
फिस्कल डेफिसिट सरकार की आय और खर्च में अंतर होता है यानी जब भी कोई सरकार अपनी आय से ज्यादा खर्च करती है तो उसे कारण होने वाले घाटे को फिस्कल डेफिसिट कहा जाता है। आपको बता दें कि फिस्कल डेफिसिट की कैलुकेशन करते समय सरकार की आय में केवल टैक्स और अन्य मदों से होने वाली इनकम को ही शामिल किया जाता है। सरकार की उधारी को इसमें जोड़ा नहीं जाता है।
उदाहरण से आपको समझाएं तो जैसे सरकार की आमदनी 10 लाख करोड़ रु है। खर्चा 12 लाख करोड़ रु है और रकम के हिबास से 2 लाख करोड़ रु ज्यादा खर्च हुआ जो कि फिस्कल डेफिसिट होगा।
फिस्कल डेफिसिट से जुड़ी खास बातें
फिस्कल डेफिसिट का एक लक्ष्य तय किया जाता है और पूरे वर्ष सरकार की कोशिश होती है कि अपने खर्च को इस टारगेट के अंदर ही रखा जाए। फिस्कल डेफिसिट को जीडीपी के प्रतिशत के रूप में मापा जाता है। अगर किसी सरकार का फिस्कल डेफिसिट उसके बजट अनुमान से ज्यादा हो जाता है तो उसे ज्यादा उधार लेकर उसकी पूर्ति करनी पड़ती है।
सरकार जब फिस्कल डेफिसिट का आकलन करती है तो उसमें तीन-चार तरह की आमदनी जोड़ती है। टैक्स रेवेन्यू, नॉन टैक्स रेवेन्यू, कर्ज की वसूली और दूसरे स्रोत से होने वाली आमदनी।
सरकार के फिस्कल डेफिसिट से आम जनता का क्या लेना देना?
सरकार का अगर फिस्कल डेफिसिट बढ़ता है तो सरकार खर्च पर कंट्रोल करती है। राहत देने से बचती है। जैसे पेट्रोल डीजल पर टैक्स नहीं घटाती है और तब भी बात नहीं बनती तो उधारी यानी बॉरोईंग करती है। जब बॉरोईंग ज्यादा करती है तो आम जनती की सेविंग पर ब्याज कम होने का खतरा भी घूमने लगता है। अर्थव्यवस्था में तेजी के लिए फिस्कल डेफिसिट को काबू में रखना बेहद जरूरी है। इस बजट को लेकर आम आदमी से लेकर कारोबारी, नौकरीपेशा और महिला जगत को तमाम उम्मीदें हैं इसलिए इस बार फिस्कल डेफिसिट सरकार क्या पेश करती है वो जानना काफी अहम होगा।
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