नई दिल्ली, अप्रैल 6। हर निवेशक अपने पोर्टफोलियो में मल्टीबैगर रखना चाहता है, लेकिन ऐसे शेयरों को ढूंढना कोई आसान काम नहीं है। मुख्य रूप से ऐसे शेयरों की खोज करते समय तीन चीजों पर ध्यान देने की आवश्यकता होती है। यदि आप अपने पोर्टफोलियो में लंबी अवधि के वेल्थ क्रिएटर्स (पैसे कई गुना करने वाले) की पहचान करना चाहते हैं तो इन चीजों को देखना जरूरी है। आगे जानिए ये तीन चीजें क्या हैं।
हाई ग्रोथ + नियोजित पूंजी (कैपिटल एम्प्लॉयड) पर हाई रिटर्न (आरओसीई)
एक स्टॉक को मल्टीबैगर बनने के लिए, कंपनी को अपनी कमाई को लगातार हाई रेट से बढ़ाना होता है और नियोजित पूंजी पर अपने रिटर्न को खराब किए बिना इसे हासिल करना होता। जैसे कि हनीवेल ऑटोमैशन की कमाई का 5 साल का सीएजीआर (चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर) 28.4 फीसदी, एवरेज आरओसीई 27.3 फीसदी और 5 साल का सीएजीआर रिटर्न 31.5 फीसदी रहा है। इसी तरह डिवाइस लैब्स के लिए यह चीजें क्रमश: 17.0 फीसदी, 30.4 फीसदी और 48.7 फीसदी रही हैं।
बढ़ता हुआ कैश फ्लो
किसी कंपनी के प्रदर्शन का आकलन करने के लिए किसी कंपनी का कैश फ्लो सबसे सटीक पैमाना है। कैश फ्लो स्टेटमेंट भविष्य में कंपनी की कमाई बढ़ाने की क्षमता को तय करता है। यदि कंपनी ऑपरेशन से कैश जनरेट करने में सक्षम नहीं है, तो उसे अपने बिजनेस को बढ़ाने के लिए लोन या इक्विटी पूंजी के रूप में पैसा जुटाने के लिए बार-बार बाजार का रुख करना होता है। मल्टीबैगर कंपनियां, चक्रवृद्धि मुनाफे के अलावा, लगातार अपने ऑपरेटिंग कैश फ्लो (नकद लाभ - वृद्धिशील कार्यशील पूंजी) को को बढ़ाती हैं जिससे वे साल दर साल तेज गति से ग्रोथ हासिल कर सकें। कंपनियां जो कमाई और कैश फ्लो के मोर्चे पर अच्छा प्रदर्शन कर सकती हैं, लेकिन ग्रोथ के मोर्चे पर नहीं, उनके अस्तित्व के एक स्थिर चरण में हो सकती हैं और इसलिए निवेशकों के लिए रिटर्न नहीं दे सकती हैं।
पूंजी का चतुर आवंटन
अंत में बात करते हैं कि पूंजी के चतुर आवंटन की। जैसा कि अब हम जानते हैं, वेल्थ क्रिएशन इनकम और कैश फ्लो के लॉन्ग टर्म कम्पाउंडिंग पर आधारित है। उपरोक्त दो मानदंडों पर खरा उतरने करने वाली कंपनियां भारी मात्रा में कैश और कैपिटल जनरेट करती हैं। लेकिन एक कंपनी किस तरह अपनी पूंजी आवंटित करती है यही फर्क एक अच्छी कंपनी और एक महान मल्टीबैगर स्टॉक के बीच महत्वपूर्ण अंतर बन जाता है। यह भी देखा गया है कि जिन कंपनियों ने अतीत में पूंजी का गलत आवंटन किया और भविष्य में गलतियों से सबक लिया, उनकी वैल्युएशन/प्राइस प्रदर्शन में भी समय के साथ सुधार हुआ।
वैल्यू पर करें फोकस
दुनिया के मशहूर निवेशक वॉरेन बफेट कहते हैं कि प्राइस वह है जो आप चुकाते हैं। मगर वैल्यू वह है जो आपको मिलती है। इसलिए वैल्यू इनवेस्टर्स वे इनवेस्टर्स होते हैं, जो उन शेयरों की तलाश करते हैं, जिनके लिए उन्हें लगता है कि वे अंडरवैल्यूड हैं। अंडरवैल्यू का मतलब होता है सस्ता शेयर और यहां सस्ते का मतलब कीमत से नहीं है। प्राइस-अर्निंग रेशियो (पी/ई) सस्ते शेयरों की पहचान करने का मुख्य फैक्टर है। हाई पी/ई अनुपात बताता है कि कंपनी की कमाई की तुलना में स्टॉक की कीमत अधिक है। दूसरी ओर लो पी/ई अनुपात बताता है कि कंपनी की कमाई की तुलना में शेयर की कीमत कम है और इसलिए अंडरवैल्यूड है।
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