जानिए कितना बीमा ले सकते हैं आप, ये हैं सामान्य से नियम

नई दिल्ली। आप कितना बीमा वास्तव में ले सकते हैं, यह जानना बहुत जरूरी है। क्योंकि इसके बिना अगर आपने बड़ी रकम का बीमा ले लिया है और बाद में अगर क्लेम की नौबत आती है, तो बीमा कंपनी आपके नॉमनी को दावे की रकम देने से मना कर सकती है। ऐसे में कुछ सामान्य से नियम जरूर जान लेना चाहिए।
बीमा पॉलिसीधारक और कंपनी के बीच में एक कॉन्ट्रैक्ट है। किसी बीमा प्रस्ताव को स्वीकार किया जाए या नहीं किया जाए, यह पॉलिसीधारक और बीमा कंपनियों के रूल्स पर निर्भर करता है। इस प्रक्रिया को अंडरराइटिंग के रूप में जाना जाता है। हम में से कुछ लोगों को लगता है कि हम प्रीमियम देखकर कितने का भी बीमा ले सकते हैं, परंतु ऐसा नहीं है। हर व्यक्ति को बीमा उसके वित्तीय आधार, उम्र, मेडिकल रिपोर्ट्स, व्यवसाय इत्यादि पर निर्भर करता है। हर व्यक्ति को बीमा लेने की एक लिमिट होती है। जैसे मान लें यदि कोई 10 हजार रुपये मासिक कमाने वाला व्यक्ति चाहे कि उसे 10 करोड़ रुपये का बीमा मिल जाए और वो प्रीमियम देने को भी तैयार है, तब भी बीमा कंपनी उसे बीमा नहीं देगी। इसी तरह यदि कोई हॉस्पिटल में एडमिट व्यक्ति जिसको डॉक्टरों ने बचने की आस छोड़ी हो, ऐसा व्यक्ति चाहे कि उसके परिवार के लिए उसको बीमा मिल जाए और वह भारीभरकम प्रीमियम देने को भी तैयार है, तो भी बीमा कंपनी से उसे बीमा नहीं देगी। तो आइए जानते हैं कि बीमा मिलने के लिए क्या-क्या आधार होते हैं और व्यक्ति को कितना बीमा कवर मिल सकता है। यहां पर आपको जो आंकड़े बताया जा रहे हैं, वह अलग-अलग कंपनियों के लिए थोड़ा-थोड़ा अलग हो सकता है।

वित्तीय आधार

उम्र अगर 0 से 35 वर्ष : यदि व्यक्ति की आय 10 लाख रुपये वार्षिक से कम है, तो व्यक्ति को उसकी वार्षिक आय का 25 गुना तक का बीमा मिल सकता है। यदि व्यक्ति की आय 10 लाख रुपये से अधिक है, तो उस व्यक्ति को उसकी वार्षिक आय का 30 गुना तक बीमा कवर मिल सकता है।

उम्र 36 से 45 वर्ष : यदि व्यक्ति की आय 10 लाख रुपये वार्षिक से कम है, तो उस व्यक्ति को उसकी वार्षिक आय का 20 गुना तक बीमा मिल सकता है। वहीं यदि व्यक्ति की आय 10 लाख रुपये वार्षिक से अधिक है, तो उस व्यक्ति को उसकी वार्षिक आय का 25 गुना तक इंश्योरेंस मिल सकता है।

उम्र 46 से 50 साल : यदि व्यक्ति की आय 10 लाख रुपये वार्षिक से कम है, तो उस व्यक्ति को उसकी वार्षिक आय का 15 गुना तक इंश्योरेंस मिल सकता है। वहीं यदि व्यक्ति की आय 10 लाख रुपये वार्षिक से अधिक है, तो उस व्यक्ति को 20 गुना तक इंश्योरेंस मिल सकता है।

उम्र 51 से 55 साल : व्यक्ति को उसकी वार्षिक आय का 15 गुना तक बीमा मिल सकता है।

उम्र 56 साल से ऊपर : यदि व्यक्ति की उम्र 56 साल से ऊपर है, तो उस व्यक्ति को उसकी वार्षिक आय का 10 गुना तक ही बीमा दिया जा सकता है।

नाबालिग बच्चे : किसी नाबालिग बच्चे को 2 करोड़ तक का इंश्योरेंस दिया जा सकता है, लेकिन बच्चे का इंश्योरेंस उसके अभिभावक की आय और उनके इंश्योरेंस पर निर्भर करता है। यदि अभिभावक का इंश्योरेंस बच्चे के इंश्योरेंस से कम है, तो बीमा कंपनी बच्चे को केवल 25 लाख से अधिक का इंश्योरेंस नहीं दे सकती है। लेकिन यदि बच्चा 18 साल पूरे कर चुका है, और अभी पढ़ रहा है, तो बच्चे को 2 करोड़ तक का इंश्योरेंस बिना अभिभावक के इंश्योरेंस के भी दिया जा सकता है।

जानिए वार्षिक आय का मतलब

इन्वेस्टमेंट एडवाइजर स्वीटी मनोज जैन के अनुसार यहां पर वार्षिक आय का मतलब 3 सालों की औसत आय से है। कम बीमा धन में यह 1 या 2 साल की आय पर भी बीमा लिया जा सकता है या केवल प्रस्तावक द्वारा ब्यौरा देने को ही सत्यापित माना जाता है। लेकिन ज्यादा अमाउंट का बीमा लेने पर 3 वर्षों की आय का ब्यौरा, फॉर्म-16, आइटीआर, सैलरी स्लिप आदि देना होगी।

यदि कोई व्यक्ति इससे ज्यादा का बीमा लेना चाहे, तो बीमा कंपनी द्वारा 20 परसेंट अधिक बीमा, उसकी मेडिकल रिपोर्ट, जीवन स्तर और जीवन शैली आदि के आधार पर ब्रांच मैनेजर लेवल या उससे ऊपर के अधिकारियों स्वीकृत किया जा सकता है।

बीमा लेने के अन्य आधार

बीमा लेने के अन्य आधार

आयु : कम आयु में प्रस्तावक अधिक बीमा ले सकता है, तथा बीमा प्रीमियम की रकम भी कम होती है। आयु के साथ-साथ बीमा की रकम कम हो जाती है तथा प्रीमियम भी बढ़ जाता है। जितनी बड़ी आयु में बीमा लिया जाता है, बीमा कंपनी उतना अधिक दस्तावेज तथा रिपोर्ट मांगती है।

लिंग : बीमा कंपनियों द्वारा महिलाओं तथा बच्चों के लिए अलग-अलग प्रीमियम या बीमा की रकम अलग हो सकती है। महिलाओं की प्रेगनेंसी तथा उसके 3 माह बाद के दौरान तथा अन्य स्थितियों में बीमा प्रस्ताव को मना या अधिक प्रीमियम पर स्वीकार किया जा सकता है।

नाबालिग बच्चे : नाबालिग बच्चों का बीमा माता-पिता की वित्तीय क्षमता पर निर्भर करता है। नाबालिग बच्चों की शारीरिक काया ठीक से विकसित होनी चाहिए तथा माता-पिता भी पर्याप्त रूप से बीमित होने चाहिए।

शारीरिक स्थिति : प्रस्तावक की शारीरिक स्थिति जैसे प्रस्तावक की लंबाई, वजन, बीएमआई आदि भी बीमा कंपनियां जांच करती है। नॉर्मल होने पर नॉर्मल प्रीमियम अथवा नॉर्मल न होने पर अधिक प्रीमियम या बीमे को नकार सकती है।

शारीरिक अपंगता : जैसे बहरापन, अंधापन, लंगड़ापन या किसी गंभीर बीमारी से ग्रसित होने की स्थिति में भी बीमा कंपनी बीमा का प्रीमियम या बीमे की रकम में बदलाव कर सकती है।

पारिवारिक इतिहास : बीमा कंपनियां अपने प्रस्ताव में पारिवारिक इतिहास यानि परिवार में सभी की उम्र तथा बीमारियों के इतिहास के बारे में भी पूछती हैं। यदि प्रस्तावक द्वारा किसी वंशागत बीमारी के बारे में जिक्र किया जाता है तो बीमा कंपनी प्रस्तावक का मेडिकल करा सकती है या बीमा का प्रीमियम या बीमे की रकम में बदलाव कर सकती है।
व्यावसायिक जोखिम : यदि प्रस्तावक किसी ऐसे व्यवसाय में काम करता है, जहां जोखिम हो सकता है। जैसे यदि प्रस्तावक किसी एक्स-रे लैब में काम करता है तो उसके शरीर पर एक्स-रे रेडिएशन का प्रभाव जल्दी होगा तथा जीवन का जोखिम ज्यादा होगा, ऐसी स्थिति में बीमा कंपनी द्वारा प्रीमियम को बढ़ाया जा सकता है या मेडिकल जाँच कराई जा सकती है।

जीवन शैली : प्रस्तावक की आदतों जैसे शराब पीना, धूम्रपान करना, गुटका खाना इत्यादि के बारे में प्रस्तावक से पूछा जाता है। यदि मेडिकल जांच में इन आदतों की वजह से शरीर के किसी अंग पर कोई अत्यधिक प्रभाव होता है, तो बीमा कंपनी बीमा देने से मना भी कर सकती है या इसी आधार पर बीमा की रकम या बीमा का प्रीमियम बदला जा सकता है।

मेडिकल जाँच

 इंश्योरेंस देने के लिए बीमा कंपनी वित्तीय आधार के साथ-साथ मेडिकल आधार भी देखती हैं। इसे उम्र के हिसाब से बांटा गया है। मेडिकल आधार भी पॉलिसी लेने वाले के प्रोफेशन और सामाजिक स्तर पर निर्भर करता है। बीमे की रकम के साथ साथ जाँच का स्तर भी बढ़ता जाता है।

खुद की आय वाले व्यस्त पुरुष और महिलाएं

खुद की आय वाले व्यस्त पुरुष और महिलाएं

बीमा कंपनियां बिना मेडिकल के उम्र के हिसाब से बीमा देती हैं, जो कम उम्र पर अर्थात 18 से 35 साल तक 8 लाख रुपये, 36 से 45 साल तक 5 लाख तथा 46 से 50 साल की उम्र पर 3 लाख तक हो सकता है। एकमुश्त प्रीमियम या सिंगल प्रीमियम पर ज्यादा भी बीमा दिया जा सकता है, जो बिना मेडिकल के दिया जा सकता है। इससे ऊपर बीमा करवाने पर प्रस्तावक को मेडिकल करवाना होगा।

सरकारी नौकरी, पीएसयू या प्रख्यात कंपनी में काम करने वाले

उनके लिए बीमे की रकम 18 से 35 साल पर 30 लाख, 36 से 45 साल पर 20 लाख और 46 से 50 साल पर 10 लाख हो सकती है, जो बिना मेडिकल के दी जा सकती है।

प्रोफेशनल, पोस्ट ग्रेजुएट, डॉक्टर, टीचर, वकील इत्यादि
18 से 35 साल पर 25 लाख रुपये, 36 से 45 साल पर 15 लाख रुपये और 46 से 50 साल की उम्र तक 8 लाख का बीमा बिना मेडिकल के ले सकते हैं। इसके ऊपर बीमा कराने के लिए कंपनी द्वारा मेडिकल कराया जाएगा।

छोटे बच्चों का बीमा
छोटे बच्चों का बीमा भी बिना मेडिकल की उम्र 0 से 9 साल तक 40 लाख रुपये, 10 साल से 17 साल की उम्र तक 15 लाख रुपये का बीमा लिया जा सकता है। वयस्क विद्यार्थी बच्चों को जिनकी उम्र 30 साल से कम है, 20 लाख रुपये तक का बीमा बिना मेडिकल के लिया जा सकता है।

बड़ी राशि का बीमा
बीमे की राशि जितनी बड़ी होती है, बीमा कंपनी बीमा देते वक्त उतना ही ध्यान रखती है। जैसे-जैसे बीमा राशि बड़ी होती जाती है पॉलिसीधारक की आय तथा मेडिकल से संबंधित सभी दस्तावेज बढ़ते जाते हैं। बड़े बीमे मैं मेडिकल जाँच का स्तर बढ़ता जाता है।

बीमा कंपनियां देखती हैं अपना जोखिम

बीमा कंपनियां देखती हैं अपना जोखिम

बीमा कंपनियां विभिन्न जोखिम के आधार पर यह निर्धारित करती हैं कि प्रस्तावक को बीमा दिया जा सकता है या नहीं। अन्यथा उसे कितना बीमा दिया जा सकता है और प्रस्तावक को मेडिकल की आवश्यकता है या नहीं। अगर है तो किस स्तर के मेडिकल की आवश्यकता है तथा प्रस्तावक को नॉर्मल दरों पर बीमा दिया जा सकता है या एक्स्ट्रा प्रीमियम अधवा उच्च प्रीमियम पर बीमा दिया जाना है।

प्रस्तावक की प्राथमिक जाँच : प्रस्तावक की प्राथमिक जानकारी का कार्य एजेंटों द्वारा किया जाता है। जो प्रस्तावक की गोपनीय जानकारी जैसे व्यवसाय, आय स्थिति, मानसिक स्थिति, व्यवसाय आदि की रिपोर्ट तैयार करता है। एजेंट यह भी सुनिश्चित करता है कि उस व्यक्ति को कितना बीमा दिया जा सकता है। इसके बाद यह प्रस्ताव बीमा कंपनी को भेजा जाता है। इसके बाद बीमा कंपनी अपने रूल्स के हिसाब से इसे चेक करती है कि उस व्यक्ति को कितना बीमा दिया जा सकता है। इसके अलावा प्रस्तावक को बीमे के लिए मेडिकल की आवश्यकता है या नहीं। अगर मेडिकल की आवश्यकता है तो वह मेडिकल किस लेवल का होगा अर्थात उस मेडिकल में क्या-क्या जांच होगी, जो बीमा कंपनियों द्वारा अधिकतर मुक्त कराई जाती हैं। 

क्लेम के समय क्यों करना पड़ सकता है परेशानियों का सामना

क्लेम के समय क्यों करना पड़ सकता है परेशानियों का सामना

इसीलिए जब भी आप किसी भी बीमे के लिए प्रस्ताव फॉर्म भरें, उस में दिए गए सभी कॉलम्स को ध्यान से पढ़ें तथा तभी उस फॉर्म पर साइन करें। ये भी जाँच लें की पूरा फॉर्म भरा हो। ज्यादातर एजेंट कई जानकारी छिपाने की सलाह देते हैं। लेकिन ऐसा नहीं करना चाहिए, क्योंकि यदि पॉलिसी अवधि के दौरान पॉलिसी धारक की मृत्यु हो जाती है तथा पॉलिसी का क्लेम बीमा कंपनी में जाता है, तो बीमा कंपनी अपने अनुसार उसको चेक करती है। यदि बीमा लेते वक्त पॉलिसी धारक के द्वारा दी गई जानकारी उपयुक्त नहीं होती तो बीमा कंपनी द्वारा उस दावे को रोका जा सकता है। इसलिए जब भी फॉर्म भरें अपनी मेडिकल स्थिति, व्यवसाय, आय पारिवारिक स्थिति, पारिवारिक इतिहास इत्यादि को बड़े ध्यान से भरें तथा पूरा फॉर्म भरने के बाद ही जांच करें। अन्यथा क्लेम लेते वक्त नॉमिनी को बीमा कंपनी द्वारा दावे में परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।

पॉलिसी लेते वक्त फॉर्म में अपनी पुरानी पॉलिसियों की स्थिति, जिसके बारे में फॉर्म में पूछा जाता है, सही प्रदान करें। ताकि बीमा कंपनी द्वारा आपका वित्तीय तथा मेडिकल संबंधी आधार को जाना जा सके। यदि यह जानकारी सही नहीं दी गई है तो बीमा कंपनी द्वारा दावे को नकारा जा सकता है। इसलिए हमेशा प्रस्ताव फॉर्म में सभी सूचनाएं सही भरें, जिससे दावे के वक्त नॉमिनी को परेशानी का सामना ना करना पड़े।

More From GoodReturns

Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+