नई दिल्ली। भारत की नरेंद्र मोदी सरकार ने पाकिस्तान से मोस्ट फेवर्ड नेशन (most favored nation) यानी एमएफएन (MFN) का दर्जा छीन लिया है। मोदी सरकार के इस फैसले से आर्थिक दिक्कतें झेल रहे पाकिस्तान की मुश्किलें और बढ़ जाएंगी। पाकिस्तन के कारोबारियों का कई इंडस्ट्री के लिए कच्चा माल भारत से ही मिलता है। मोदी सरकार के इस फैसले से पाकिस्तान में सामान बनाना और महंगा हो जाएगा, जिससे उसके निर्यात पर असर पड़ेगा। इस पाकिस्तान के पास केवल 6 हफ्त के आयात बिल भरने लायक ही विदेशी मुद्रा बची है। वैसे भी पाकिस्तान में इमरान खान प्रधानमंत्री बनने के बाद से विदेशों में जा जाकर पैसा मांग रहे हैं, लेकिन चीन और अरब के अलावा अभी और कही से उन्हें आर्थिक मदद नहीं मिली है, जिससे पाकिस्तान को IMF जाना पड़ रहा है। हालांकि चुनाव के दौरान इमरान खान ने देश के लोगों से वादा किया था कि वह IMF से कर्ज किसी भी सूरत में नहीं लेंगे। भारत के इस कठोर फैसले से पाकिस्तान का निर्यात प्रभावित होता है तो उसे अब IMF की और कठोर शर्तों को मानना पड़ेगा। मोदी सरकार ने यह फैसला कश्मीर में पाक समर्थित आतंकियों की तरफ सुरक्षबलों पर किए हमले के बाद यह फैसला लिया गया है। इस हमले में 40 से ज्यादा जवानों की शहादत हुई है।

पाकिस्तान से एमएफएन (MFN) का दर्जा छिनने से क्या होगा नुकसान
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने पाकिस्तान के एमएफएन (MFN) दर्जा वापस लेने का फैसला कर लिया है। पाकिस्तान को साल 1996 में एमएफएन (MFN) के दर्जा दिया गया था, जो अब छीन लिया गया है। मोदी सरकार के इस फैसले से द्विपक्षीय व्यापार में गिरावट आएगी। हालांकि भारत-पाकिस्तान के बीच बहुत कारोबार नहीं होता है, लेकिन पहले से ही कंगाली झेल रहे पाकिस्तान को इससे काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार एमएफएन (MFN) का दर्जा छिनने से पाकिस्तान के उद्योगों को बड़ा झटका लगेगा। पाकिस्तानी कारोबारियों को अब कम कीमत पर कच्चा माल जुटाना मुश्किल हो जाएगा।
पाकिस्तान से कारोबार एक नजर में
-1996 में भारत ने पाकिस्तान को एमएफएन (MFN) का दर्जा दिया
-2.17 अरब डॉलर का निर्यात भारत ने पाकिस्तान को किया 2015-16 में
-0.44 अरब डॉलर का आयात पाकिस्तान से भारत ने किया 2015-16 में
-2.70 अरब डॉलर का कुल द्विपक्षीय व्यापार हुआ दोनों देशों के बीच 2015-16 में
-2.35 अरब डॉलर का द्विपक्षीय व्यापार हुआ था 2014-15 में
क्या होता है मोस्ट फेवर्ड नेशन (most favored nation) (MFN) का दर्जा
एमएफएन (MFN) का पूरा मतलब मोस्ट फेवर्ड नेशन होता है, जिसमें एक देश दूसरे देश को कारोबार के लिए तरजीही दर्जा देता है। विश्व व्यापार संगठन और अंतरराष्ट्रीय ट्रेड नियमों के तहत व्यापार में सर्वाधिक तरजीही राष्ट्र का दर्जा देने का नियम है। एमएफएन (MFN) का दर्जा मिलने के साथ ही उस राष्ट्र को यह आश्वासन भी दिया जाता है कि उसे कारोबार में नुकसान नहीं पहुंचाया जाएगा।
डब्ल्यूटीओ ने बनाएं हैं एमएफएन (MFN) नियम
शुल्क तथा व्यापार पर विश्व व्यापार संगठन के जनरल एग्रीमेंट (गैट) के एमएफएन (most favored nation) सिद्धांत के अनुसार डब्ल्यूटीओ के हर सदस्य को एक दूसरे के साथ मोस्ट फेवर्ड ट्रेडिंग पार्टनर (most favored nation) होने के नाते समान व्यवहार करना होता है। भारत ने इस करार पर हस्ताक्षर किए हुए हैं। इस एमएफएन (MFN) में एक तरह से किसी राष्ट्र को दिया जाने वाला स्पेशल ट्रीटमेंट होता है, यानी यह बिना भेदभाव वाला व्यापार समझौता।
एमएफएन (MFN) का दर्जा मिलने के फायदे
सर्वाधिक तरजीही राष्ट्र (most favored nation) का दर्जा किसी राष्ट्र को कारोबार में प्राथमिकता देने के उद्देश्य से दिया जाता है। इसमें दर्जा प्राप्त देशों को आयात-निर्यात में विशेष छूट दी जाती है। यानी सदस्य देशों को कम आयात शुल्क भरना होता है। वैसे तो डब्ल्यूटीओ से जुड़े देश ओपन ट्रेड और बाजार से बंधे होते हैं, लेकिन एमएफएन (MFN) के नियमों के कारण इन देशों को विशेष छूट दी जाती है।
कैसे मिलता है एमएफएन का दर्जा और फायदे
-एमएफएन (MFN) का दर्जा विश्व व्यापार संगठन के मुताबिक एक देश दूसरे को देते हैं, ताकि उनके बीच कारोबारी रिश्ते को आसान किया जा सके।
-अगर एमएफएन (MFN) दर्जे से फायदे की बात की जाए तो विकासशील देशों के लिए यह काफी फायदेमंद होता है। व्यापार के लिहाज से फायदेमंद माने जाने वाले इस दर्जे को हासिल करने वाले देश को आयात शुल्क में छूट मिलने के साथ-साथ नौकशाही के स्तर पर आने वाली तमाम अड़चनों और कई तरह के शुल्कों में कुछ छूट मिल जाती है।
एमएफएन (MFN) के नुकसान भी
ऐसा नहीं है कि एमएफएन (MFN) का दर्जा मिलने के सभी फायदे ही हों, इसके कुछ नुकसान भी हैं। एमएफएन दर्जा प्राप्त देश को डब्ल्यूटीओ से संबंधित सभी देशों से एक समान व्यवहार करना पड़ता है। इससे होता यह है कि देश में सस्ता आयात होने लगता है जिससे देश के घरेलू उत्पादकों को नुकसान उठाना पड़ सकता है।
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