हाल ही में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) ने ऑफ-बजट फाइनेंसिंग का ज्यादा इस्तेमाल करने के लिए सरकार की खिंचाई की है।
हाल ही में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) ने ऑफ-बजट फाइनेंसिंग का ज्यादा इस्तेमाल करने के लिए सरकार की खिंचाई की है। सरकार ने वित्त वर्ष 2017 की फिस्कल रेस्पॉन्सिबिलिटी एंड बजट मैनेजमेंट एक्ट के अनुपालन रिर्पोट में योजनाओं और सब्सिडी के लिए इसका अधिक उपयोग किया है। तो चलिए आपको बताते हैं कि ऑफ-बजट फाइनेंसिंग क्या होती है और इसका क्या असर पड़ता है?
ऑफ-बजट फाइनेंसिंग के बारे में
ऑफ-बजट फाइनेंसिंग का मतलब उस खर्च से है, जिसे बजट के जरिए पूरा नहीं किया जाता है। उदाहरण के रुप में मान लेते हैं कि एक ब्रिज के निर्माण के लिए सरकार स्पेशल पर्पज व्हीकल (एसपीवी) बनाती है। SPV सरकार की गारंटी पर पुल के निर्माण के लिए उधार लेगी। यदि टोल से ब्याज का भुगतान नहीं होता है तो उसकी भरपाई के लिए उसे सरकारी मदद की जरूरत होगी।
इस तरह उधारी और खर्च भले ही बजट के बाहर हों, लेकिन इसका असर बजट पर पड़ता है। ऐसे में व्यावहारिक रूप से इसका उल्लेख बजट दस्तावेज में होना चाहिए। नहीं होने पर यह राजकोषीय योजनाओं के आंकड़ों में भी नहीं दिखता है। दुनियाभर में सरकारें ऑफ-बजट फाइनेंसिंग का इस्तेमाल करती हैं।
ऑफ-बजट फाइनेंसिंग की जरुरत और असर
राजकोषीय संकेतक को कैलकुलेट करते वक्त ऑफ-बजट फाइनेंसिंग को ध्यान में नहीं रखा जाता है। इस तरह की फाइनेंसिंग कुछ हद तक सरकार के मूल खर्च, कर्ज, उधारी और ब्याज के बढ़ते बोझ को छुपा देते हैं। ऊपर के उदाहरण में आपने देखा कि एसपीवी की उधारी कायदे से सरकार के कर्ज में शामिल होना चाहिए। जिस सीमा तक सरकार इस खर्च को गारंटी देती है, उसके साथ राजकोषीय जोखिम है। बजट के बाहर होने से इस तरह के खर्च पर संसदीय नियंत्रण भी कम हो जाता है।
फाइनेंशियल ईयर 2017 में ऑफ-बजट की फंडिंग
1. विशेष बैंकिंग व्यवस्था के जरिए फर्टिलाइजर के एरियर/बिल टाले गए।
2. उधारी के माध्यम से खाद्य सब्सिडी बिल/भारतीय खाद्य निगम के एरियर दिए गए।
3. नेशनल बैंक फॉर एग्रिकल्चर एंड रुरल डेवलपमेंट की उधारी के जरिए सिंचाई कार्यक्रम को स्पीड दी गई।
पूंजीगत खर्च
- रेलवे परियोजनाओं के लिए Indian रेलवे फाइनेंस कॉरपोरेशन की बॉरोइंग
- पावर प्रोजेक्टों की पावर फाइनेंस कॉरपोरेशन फंडिंग
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