यहां पर आपको बताएंगे कि भारत की जीडीपी क्या है साथ ही यह भी बताएंगे कि भारत में सकल घरेलू उत्पाद की गणना कैसे होती है।
जीडीपी यानि सकल घरेलू उत्पाद का मतलब है देश में वस्तुओं और सेवाओं का कुल योग, जिन्हें पैसे में गिना जा सकता है, जो कि एक खास अवधि मुख्य तौर पर एक साल के लिए होता है। यह एक महत्वपूर्ण सूक्ष्म आर्थिक पैमाना जो कि अर्थव्यवस्था की क्षमता और दक्षता (प्रभाव) का प्रतीक है।
ऐसा इसलिए हैं क्यों कि GDP कई सामाजिक-आर्थिक मानकों से जुड़ी हुई है जैसे कि गरीबी, बेरोजगारी, जीवन स्तर, शिक्षा, स्वास्थ्य स्तर आदि। अधिकतर मामलों में यह जुड़ाव थोड़ा या बढ़ोतरी के आधार पर होता है।
लगातार बढ़ती हुई जीडीपी अर्थव्यवस्था में गरीबी, स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा, रोजगार आदि पर सकारात्मक प्रभाव डालती है। इसलिए राज्य के आर्थिक कल्याण के लिए जीडीपी की धारणा को समझना बेहद ज़रूरी है।
जीडीपी की गणना कैसे करें?
जीडीपी की गणना में यह समीकरण काम में लिया जा सकता है।
सकल घरेलू उत्पाद = निजी खपत + सकल निवेश + सरकारी निवेश + सरकारी खर्च + (निर्यात - आयात)
जीडीपी डिफ्लेटर (अपस्फीतिकारक) बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि यह कीमत की मुद्रास्फीति को मापता है।
इसकी गणना वास्तविक जीडीपी में से अवास्तविक (नामिक) जीडीपी को विभाजित करके और 100 से गुणा करके की जाती है (फोर्मूले के आधार पर)।
जीडीपी के प्रकार
जीडीपी को परिभाषित करना आसान है लेकिन इसकी गणना करना मुश्किल। यह यूनिट कीमत द्वारा कुल वस्तुओं और सेवाओं का कुल योग है। मुश्किल यह है कि देश के भीतर अलग-अलग जगह कीमतें लगातार बदलती रहती है। इस कारण से इसकी तुलना कठिन हो जाता है। इसलिए टैक्स के आधार पर कई अप्रत्यक्ष और औसत गणना के तरीके हैं, जिनसे अनुमान और गलतियों का पता चलता है।
A) वास्तविक जीडीपी
एक आधार वर्ष में कीमत फिक्स या निर्धारित रखकर जीडीपी की गणना करना एक तरीका है। यह वास्तविक जीडीपी कहलाती है जो कि आधार वर्ष में निर्धारित कीमतों पर वस्तुओं और सेवाओं की भिन्नता को दर्शाती है। भारतीय अर्थव्यवस्था का आधार वर्ष 2011-12 माना जाता है।
B) अवास्तविक जीडीपी
जब जीडीपी की गणना वर्तमान बाज़ार कीमत के आधार पर की जाती है तो यह अवास्तविक (नामिक) जीडीपी कहलाती है। वास्तविक जीडीपी सरकारी परिपेक्ष्य के आधार पर आर्थिक विकास को बेहतर तरीके से दिखाती है और यह तुलना के लिए फायदेमंद है। अवास्तविक जीडीपी वो है जो नागरिकों को सीधे तौर पर ज़्यादा प्रभावित करती है।
अवास्तविक जीडीपी का वास्तविक जीडीपी में अनुपात लागत मुद्रास्फीति सूचकांक कहलाता है(कोस्ट इन्फ़्लेशन इंडेक्स यानि सीआईआई)। पूरे बिक्री मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) और उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) मुद्रास्फीति की वास्तविक तस्वीर पेश करने के लिए सीआईआई डेटा से लिए जाते हैं क्यों कि आम आदमी को प्रभावित करते हैं। इनमें से अधिकतर सूचकांक सकल घरेलू उत्पाद के आंकड़ों को इकट्ठा करके प्रापट होते हैं और नजदीकी से जुड़े होते हैं।
भारत में GDP अनुमान
भारत में सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय राष्ट्रीय सकल घरेलू उत्पाद का आकलन करता है। केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय के तहत राष्ट्रीय लेखा प्रभाग नेशनल अकाउंट्स तैयार करता है, जीडीपी अनुमान जिसका एक हिस्सा है।
जीडीपी अनुमान हर तिमाही में तैयार किए जाते हैं और दो महीने के अंतराल में प्रकाशित होते हैं। वार्षिक जीडीपी अनुमान हर साल 31 मई को प्रकाशित होते हैं। सकल घरेलू उत्पाद के अनुमान स्थिर मूल्यों और वर्तमान मूल्य दोनों पर तैयार किए जाते हैं। जीडीपी अनुमान दो तरीकों से तैयार किए जाते हैं। पहला अर्थव्यवस्था में ग्रोस वेल्यू एडिशन को एक जगह करके और दूसरा अर्थव्यवस्था में इस वेल्यू को पैदा करने में हुये कुल खर्च को जोड़कर।
प्रभावी रूप से अगर बात करें तो चार टेबल हैं, दो वास्तविक और अवास्तविक जीडीपी दोनों के लिए और दो आंकड़ों के उच्चतम आंकड़े को सही मूल्य के रूप में लिया जाता है। 2017-18 की चौथी तिमाही के लिए वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद 31 लाख करोड़ रुपये था जो पिछले वर्ष की इसी तिमाही की तुलना में 7.6% अधिक था। 2017-18 की चौथी तिमाही के लिए वास्तविक जीडीपी डेटा का ब्रेक-अप इस प्रकार है।
अवास्तविक या नामिक जीडीपी की गणना भी इसी प्रकार की जाती है लेकिन उसमें वर्तमान बाज़ार मूल्य का इस्तेमाल किया जाता है। 2017-18 की चौथी तिमाही में अवास्तविक जीडीपी 39 लाख करोड़ थी जो कि 11.4% की वृद्धि थी। यह अनुमान अंतिम अनुमान है। सीएसओ द्वारा जारी शुरुआती अनुमान अस्थायी होते हैं। सीएसओ ने 2017-18 जीडीपी के अस्थायी अनुमान प्रकाशित किए हैं। यह डेटा निम्न प्रकार है:-
सेक्टर के आधार पर जीडीपी का ब्रेकअप
1) कृषि: 17%
2) उद्योग: 29%
3) सेवा: 30%
सेक्टर आधारित जीडीपी ब्रेकअप भारत की अर्थव्यवस्था के प्रति चिंता जाहिर करता है।
कृषि क्षेत्र जिसमें 50% जनसंख्या लगी हुई है उसका जीडीपी केवल 17% ही है। राष्ट्रीय स्तर पर इसकी प्राथमिकता बढ़ाने के लिए कृषि क्षेत्र में सुधारों की आवश्यकता है।
दूसरा सबसे बड़ा क्षेत्र सर्विस सेक्टर है जो कि लगातार बढ़ रहा है और इसका योगदान जीडीपी का 50% है। उद्योग और कृषि क्षेत्र जिनसे वास्तव में पैसा आता है ऐसे इन दोनों क्षेत्रों को प्रभावी बना ज़रूरी है।
सकल घरेलू उत्पाद की अवधारणा में त्रुटियां (गलतियाँ)
प्रति व्यक्ति आय जीडीपी की गणना का महत्वपूर्ण कारक है। 2017-18 तक भारत के प्रति व्यक्ति जीडीपी लगभग 1,27,456 रुपये है। इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड का अनुमान है कि 70% भारतीय प्रति दिन 2 डॉलर से कम कमाते हैं, जो कि सालाना प्रति व्यक्ति लगभग 50,000 रुपये ही बताता है। इससे पता चलता है आय में एक बड़ी असमानता है।
जीडीपी आय के वितरण का अनुमान लगाने में सफल नहीं होती है। जिनी कोअफिशन्ट (गुणांक) के अनुसार आय की असमानता 0.5 है। जो कि कई देशों में 0.2 जितनी कम है और 0.6 जितनी ज़्यादा असमानता भी कई देशों में है। यह भारत के लिए एक खतरनाक स्तर है। एक उच्च जीडीपी या तेजी से बढ़ती जीडीपी जरूरी नहीं है। यह कहा जाता है कि जीडीपी स्टील और गेहूं जैसी वस्तुओं के उत्पादन को मापकर आर्थिक समृद्धि का अनुमान लगाता है।
इससे लोगों की जानकारी और नॉलेज के स्तर का पता नहीं चलता है जिनका जीवन स्तर को बढ़ाने में बड़ा योगदान है। इसी तरह, घर का काम जो कि जीवन में एक बड़ा वेल्यू पैदा करता है जीडीपी की गणना में इसे पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया जाता है। जीडीपी और बेहतर जीवन स्तर के बीच कोई खास संबंध नज़र नहीं आता है।
जीडीपी और राष्ट्रीय आपदा
राष्ट्रीय आपदा के समय जीडीपी बढ़ती है। बाढ़, भूकंप, सूखा आदि में प्रभावित जनसंख्या वाली जगह पर उत्पादकता में अस्थाई कमी के कारण गिरावट आती है। लेकिन आपदा से निपटने के लिए सरकार बड़ी मात्रा में खर्च कर जीडीपी को बढ़ाती है। इस खर्च से आर्थिक प्रगति के बजाय पुरानी स्थिति को वापस लाने की कोशिश ही की जाती है, इस तरह जीडीपी आर्थिक प्रगति की सही सूचक नहीं है।
जीडीपी की यह कमी ना केवल भारत में बल्कि दुनियाभर में दिखाई देती है। लेकिन इसका असर अलग-अलग देशों में अलग-अलग तरह होता है। उदाहरण के तौर पर आय वितरण को लें। जिन देशों का जिनी गुणांक कम होता है उनका जीडीपी बेहतर होता है क्यों कि उनकी उत्पादकता बेहतर होती है। जब जिनी गुणांक अधिक होता है तो इससे उल्टा होता है।
निष्कर्ष
2017-18 की अंतिम तिमाही में भारत की अर्थव्यवस्था की जीडीपी ग्रोथ 7.7% थी जो इसे दुनिया की तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था बनाती है। देश में इस बात की खुशी और जश्न है। यहाँ तक कि मीडिया भी तेल की कीमतों, रुपए की एक्सचेंज रेट, बैंक एनपीए या नकारात्मक आर्थिक संकेतकों को ट्रेक करता है बजाय कि अर्थव्यवस्था के 5 ट्रिलियन की ओर बढ्ने के। राष्ट्र की इस शानदार उपलब्धि को इस तरह से नज़रअंदाज़ करने में केवल राजनीति और व्यंग्यवाद का ही दोष नहीं है। भारत जैसे बड़े देश में आर्थिक विकास का प्रभाव दिखने में समय लगता है। जिन्होने 70 का दशक देखा है उन्हें पता होगा कि उस समय कैसे हर चीज के लिए लाइन लगती थी, बैंक, डाक घर, रेलवे स्टेशन, बस स्टॉप, राशन की दुकान और यहाँ तक की एसटीडी पीसीओ बूथ पर भी। अब इस बदलाव को महसूस किया जा सकता है।
तब कार और पी&टी फोन एक तरह से पारिवारिक विरासत थे जो किसी के गुजरने पर उसके परिवार को विरासत में मिलते थे। एप्पल एक फल था, ट्वीट केवल पक्षी करते थे, इंटरनेट केवल मच्छर मारने वाले ब्रांड का नाम था।
ऐसे लोग जो अब घर में एलसीडी टीवी, ऑनलाइन इंटरनेट गेमिंग और स्मार्ट फोन में सोशियल मीडिया का इस्तेमाल करते हुये पले-बढ़े हैं, वे सब उस दौर की बातों से अंजान हैं। उनकी आशाएँ विश्व स्तरीय हैं और विदेश ट्रिप जैसे उनके सपने हैं।
और हो भी क्यों नहीं? आखिर जीडीपी में वृद्धि से आर्थिक विकास आधारित आशाएँ बढ़ती हैं। यही कारण है कि भूटान जैसा देश ग्रोस हेप्पीनेस प्रॉडक्ट (सकल खुशी उत्पाद) का सूचकांक रखता है जो नागरिकों के संतोष, संतुष्टि और खुशी को मापता है।
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