जहां इक्विटी म्यूचुअल फंड्स पब्लिक लिस्टेड कंपनियों में निवेश करते हैं, वहीं डेब्ट फंड्स सरकारी और कंपनियों की फिक्स-इनकम सिक्योरिटीज में निवेश करते हैं। इनमें कॉर्पोरेट बॉण्ड, सरकारी सिक्योरिटीज, ट्रेजरी बिल, मनी मार्केट इंस्टूमेंट्स और अन्य कई प्रकार की डेब्ट सिक्योरिटीज शामिल हैं।
शेयर की तरह किसी कंपनी की इक्विटी में निवेश करना उस कंपनी की ग्रोथ के लिए हिस्सेदारी को खरीदना है। लेकिन जब आप डेब्ट फंड खरीदते हैं तो, आप जारी करने वाली संस्था को लोन देते हैं। सरकार और प्राइवेट कंपनियां अपने विभिन्न कार्यक्रमों को चलाने के लिए लोन पाने के लिए बिल और बॉण्ड जारी करती हैं।
इन डेब्ट सिक्योरिटीज से आप जो ब्याज प्राप्त करते हैं उसका ब्याज और उसकी परिपक्वता अवधि पहले से निर्धारित होती है। इसलिए इन्हें 'फिक्स इनकम' सिक्योरिटी कहा जाता है, क्योंकि इसमें आपको पता होता है कि आपको क्या मिलने वाला है।
इक्विटी फंड्स की तरह ही डेब्ट फंड्स में भी अलग-अलग सिक्योरिटीज में निवेश करके अच्छा मुनाफा बढ़ाया जाता है। डेब्ट फंड्स में अच्छा मुनाफा मिलता है, लेकिन इनमें रिटर्न्स की कोई गारंटी नहीं है। फिर भी, डेब्ट फंड्स में रिटर्न्स का अनुमान लगाया जा सकता है, जो कि इन्हें रूढ़िवादी या छोटे निवेशक के लिए सुरक्षित बनाता है।
विभिन्न सिक्योरिटीज जिनमें डेब्ट फंड निवेश करते हैं
डेब्ट फंड्स अलग-अलग क्रेडिट रेटिंग्स की विभिन्न सिक्योरिटीज़ में निवेश करते हैं। सिक्योरिटी की क्रेडिट रेटिंग उसे जारी करने वाली संस्था का जोखिम निर्धारित करती है।
ज़्यादा क्रेडिट रेटिंग का मतलब है कि मेच्योरिटी पर उस संस्था द्वारा ब्याज भुगतान और मूल राशि का भुगतान किए जाने की बेहतर संभावना है। इसलिए जो डेब्ट फंड्स हाई-रेटेड सिक्योरिटीज में निवेश करते हैं वे लो-रेटिड सिक्योरिटीज की तुलना में कम अस्थिर होती हैं।
इसके अलावा दूसरा जो पहलू है वो है कि जिस सिक्योरिटी में डेब्ट फंड निवेश किया जा रहा है उसकी मेच्योरिटी (परिपक्वता) की अवधि। विभिन्न डेब्ट फंड्स अलग-अलग समयावधि की सिक्योरिटीज में निवेश करते हैं। मेच्योरिटी का समय जितना कम होगा, नुकसान की संभावना उतनी ही कम होगी।
डेब्ट म्यूचुअल फंड के प्रकार
इक्विटी म्यूचुअल फंड की तरह ही डेब्ट म्यूचुअल फंड भी अलग-अलग तरह के होते हैं। डेब्ट फंड के बीच जो चीज सबसे बड़ा अंतर पैदा करती है वो है मेच्योरिटी का समय।
डायनामिक बॉन्ड फंड्स
जैसा कि नाम से ही पता चल रहा है ये 'डायनामिक' फंड, जिसका मतलब है कि ये बदलती ब्याज दर के अनुसार अपना पोर्टफोलियो बदलते रहते हैं। डायनामिक बॉन्ड फंड्स का मेच्योरिटी का समय बदलता रहता है क्योंकि ये ब्याज दर के अनुसार निवेश को कम या ज़्यादा समय में लगाते रहते हैं।
इनकम फंड
इनकम फंड भी ब्याज दर के अनुसार विभिन्न डेब्ट सिक्योरिटीज में निवेश करते रहते हैं, लेकिन अधिकतर इनकी मेच्योरिटी अवधि लंबे समय की होती है। इस कारण से ये डायनामिक फंड्स की तुलना में ज़्यादा स्थिर हैं। इनकी औसत मेच्योरिटी अवधि लगभग 5-6 साल की होती है।
शॉर्ट- टर्म और अल्ट्रा शॉर्ट- टर्म डेब्ट फंड्स
ये कम समयावधि के डेब्ट फंड्स होते हैं जिनका समय लगभग 3 साल का होता है। शॉर्ट- टर्म डेब्ट फंड्स सामान्य निवेशक के लिए बेहतर हैं क्योंकि ये ब्याज दरों में बदलाव से ज़्यादा प्रभावित नहीं होते हैं।
लिक्विड फंड्स
लिक्विड फंड्स डेब्ट इंस्ट्रूमेंट्स में निवेश करते हैं जिनकी मेच्योरिटी अवधि 91 दिनों से ज़्यादा नहीं होती है। इसलिए इनमें जोखिम कम होता है। इनमें नकारात्मक रिटर्न कम ही देखने को मिलते हैं।
ये फंड्स बचत बैंक खाते का अच्छा विकल्प हैं क्यों कि ये उनके समान ही तरलता और बड़े रिटर्न प्रदान करते हैं। कई म्युच्युअल फंड कंपनियां स्पेशल डेब्ट कार्ड्स के माध्यम से लिक्विड फंड निवेश को तुरंत निकालने की सुविधा भी प्रदान करती हैं।
गिल्ट फंड्स
गिल्ट फंड्स केवल सरकारी सिक्योरिटीज़ में ही निवेश करते रहते हैं। सरकारी सिक्योरिटीज हाई-रेटिड सिक्योरिटीज होती हैं और इनमें क्रेडिट रिस्क कम रहती है। ऐसा इसलिए क्योंकि सरकार कई बार डेब्ट इंस्टूमेंट्स के रूप में लिए गए लोन में डिफ़ाल्ट हो जाती है। इसलिए फिक्स इनकम वाले निवेशक जो रिस्क नहीं लेना चाहते, उनके लिए गिल्ट फंड्स अच्छा विकल्प है।
क्रेडिट ऑपरचुनिटी फंड्स (क्रेडिट अवसर फंड्स)
ये नए डेब्ट फंड्स हैं। अन्य डेब्ट फंड्स की तरह, क्रेडिट अवसर फंड्स डेब्ट इंस्टूमेंट्स में निवेश नहीं करते हैं। ये फंड्स क्रेडिट रिस्क के अनुसार निवेश ज़्यादा मुनाफा कमाते हैं। कम रेटेड बॉन्ड जिनका ब्याज दर ज़्यादा होता है उन्हें ये फंड होल्ड करने की कोशिश करते हैं। ये डेब्ट फंड्स जोखिम भरे होते हैं।
फिक्स्ड मैच्योरिटी प्लान
फिक्स्ड मैच्योरिटी प्लान (एफएमपी) क्लोज एंड डेब्ट फंड हैं। ये भी कॉर्पोरेट बॉन्ड और सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश करते हैं, लेकिन इनमें पूंजी को रोकने का एक समय होता है।
हर FMP में एक फिक्स समय होता है जिसमें आपकी पूंजी लॉक रहती है। यह समय कुछ महीनों या सालों का हो सकता है। शुरुआती ऑफर पीरियड में एफएमपी में निवेश किया जा सकता है। एफएमपी एक फिक्स डिपॉजिट की तरह है जो टैक्स में शानदार छूट प्रदान करते हैं, लेकिन इनमें रिटर्न्स की कोई गारंटी नहीं है।
ब्याज दर डेब्ट फंड्स को कैसे प्रभावित करती है?
ब्याज दर जिसके बारे में हम अक्सर खबरों में सुनते हैं यह रेपो रेट और रिवर्स रेपो रेट होती है जो कि रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया द्वारा (आरबीआई) निर्धारित किया जाता है। आरबीआई कमर्शियल बैंकों को रेपो रेट पर पैसा उधार देता है।
कई कारण हैं जो ब्याज दर को कम या ज़्यादा करने में जिम्मेदार हैं, प्रचलित ब्याज दर भी निर्धारित करती है जिस पर संस्थाएं बॉन्ड और डेब्ट सिक्योरिटीज जारी करती हैं।
फिक्स इनकम सिक्योरिटीज की कीमत ब्याज दर से विपरीत होती है। जब ब्याज दर बढ़ती है तो बॉन्ड की कीमत कम हो जाती है। और कम होने पर कीमत ज़्यादा। यही कारण है कि जब ब्याज दर गिरती है तो डेब्ट फंड्स अच्छा मुनाफा कमाते हैं क्यों कि इनकी कीमतें बढ़ जाती हैं।
डेब्ट फंड में निवेश क्यों करें?
एक सामान्य और रूढ़िवादी निवेशक के लिए ये एक बेहतर विकल्प है। ये फिक्स डिपॉज़िट का अच्छा विकल्प है। डेब्ट फंड्स फिक्स डिपॉज़िट की रेंज में ही ब्याज देते हैं, लेकिन ये फिक्स डिपॉज़िट से ज़्यादा टैक्स में छूट प्रदान करते हैं।
फिक्स डिपॉज़िट से जो आय होती है वो आपकी इनकम में जुड़ जाती है और आपको उस स्लैब के अनुसार टैक्स देना पड़ता है। डेब्ट फंड्स के शॉर्ट-टर्म लाभ भी टैक्स योग्य आय में जुड़ती है। लेकिन जब समयावधि 3 वर्ष से ज़्यादा होती है तो टैक्स में ज़्यादा फायदा मिलता है। लंबे समय के लाभ पर इंडेक्शन के बाद 20% टैक्स लगाया जाता है।
डेब्ट फंड्स फिक्स डिपॉज़िट के बजाय ज़्यादा तरल हैं। फिक्स डिपॉज़िट में जहां पूंजी लॉक हो जाती है, वहीं डेब्ट फंड्स में कभी भी निकाली जा सकती है। कुल राशि में से कुछ राशि निकालना भी डेब्ट फंड्स में संभव है।
इन सब कारणों से डेब्ट फंड्स फिक्स डिपॉज़िट से बेहतर हैं। फिर भी, यह बात ध्यान रखनी ज़रूरी है कि फिक्स डिपॉज़िट की तरह, डेब्ट फंड्स में पूंजी की सुरक्षा या फिक्स रिटर्न की कोई गारंटी नहीं है।
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