2017 में भारतीय शेयर बाजार लगभग 25 फीसदी ऊपर रहा। साल के अंत तक भी शेयर बाजार में कोई गंभीर उथल-पुथल नजर नहीं आई। म्युचुअल फंडों में होने वाले निवेश की वजह से सेंसक्स और निफ्टी में काफी अच्छा स्कोर रहा। 2017 के यूनियन बजट के बाद से ये कुछ बूम नहीं कर पाया था पर पिछले 10 से 11 महीनों में शेयर बाजार कभी भी औंधे मुंह नहीं गिरा है।
2017 की तरह क्यों नहीं होगा 2018?
माना जा रहा है कि 2017 में जो भी रिटर्न आया है वो 2018 में आने की उम्मीद नहीं रहेगी। अगर 2018 के अंत तक बाजार 25 फीसदी बढ़ता है और 39 हजार के जादुई स्तर को छू लेता है तो फिर अच्छा माना जाएगा, पर फिलहाल मौजूदा हालातों को देखकर ऐसा नहीं लग रहा है। इसके कारण कई हो सकते हैं और लोगों का सही जगह निवेश भी मुख्य वजह हो सकती है। हालांकि कई आशावादी अनुमान भी लगाये जा रहे हैं लेकिन ये कितने ठीक होंगे ये सटीक नहीं कहा जा सकता है। इस बारे में कुछ भी इसलिए नहीं कहा जा सकता है क्योंकि बुनियादी बातों से लेकर राजनीति तक का इस पर सीधा असर पड़ता है और इनसे डील करने का तरीका भी अलग होता है।
सबसे मंहगे बाजार
भारतीय बाजार सबसे मंहगे बाजारों में से एक है, इसके लिए सेंसक्स को धन्यवाद कहने की आवश्यकता है जो विकसित बाजारों में पी/ई से 20 गुना तक होता है। आगामी वर्ष में बाजार उच्च स्तर पर बना रहेगा ऐसी उम्मीद है और म्युचुयल फंड में बढ़ोत्तरी होगी। परन्तु अगर मार्केट में लिक्विवडिटी खत्म हो गई तो बाजार के गिरने की संभावना है या लोग इन्हें वापस खींच सकते हैं। 2017-2018 में कॉरपोरेट कमाई में 10 प्रतिशत की ग्रोथ ही स्केल हुई जो अचछा आंकडा नहीं माना जा रहा है और ऐसे में इसका सीधा असर अगले वित्तीय वर्ष पर पड़ सकता है।
लोकसभा चुनावों का करीब होना
सत्तारूढ़ दल के लिए हालात बहुत अधिक जटिल हो सकते हैं क्योंकि 2019 में आम चुनावों होंगे और भाजपा पूरी कोशिश करेगी कि 2014 की तरह ही सीटों को बरकरार रखा जाये। अगर सरकार ऐसा कर पाने में सक्षम होगी तो उसका सकारात्मक असर 2019 के बाद दिखेगा न कि 2018 में। ऐसे में बाजार, खासकर शेयर बाजार के अस्थिर होने की संभावना है।
बीजेपी के प्रदर्शन के भरोसे रहेगा बाजार
भाजपा पहले ही कुछ राज्यों में पूरी तरह से शासन जमा चुकी है, गुजरात, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रेदश, दिल्ली और राजस्थान जैसे राज्यों में उसका शासन चल रहा है। ऐसे में बाकी बचे राज्यों में बीजेपी को सशक्त करने का प्रयास होगा जिसमें वैश्विक स्तर की सोच से ज्यादा क्षेत्रीय स्तर की सोच और रणनीति का इस्तेमाल होगा। ऐसे में 2018 के शेयर मार्केट की ग्रोथ के बारे में सोचना आपके लिए थोड़ा नासमझी भरा काम होगा।
ब्याज दरें और कम होना
पिछले कुछ समय से ब्याज दरों में काफी कमी आई है। आगामी वर्ष में इसमें और कमी को दर्ज किया जा सकता है। आरबीआई, ब्याज दरों को लेकर कुछ और नियम लाने की फिराक में नजर आ रहा है। कुछ अर्थशास्त्रियों का मानना है कि इससे मुद्रास्फीति में असंतुलन आएगा। बाजार में निराशा फैल सकती है। ऐसे में अगर आप अगले वर्ष शेयर में बड़ी रकम को निवेश करना चाहते हैं तो खतरनाक साबित हो सकता है। सबसे बड़ी बात यह है कि आपको गिरावट का इंतजार करना होगा।


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