जानिए इस इंजीनियर ने ऐसा क्‍या किया कि आ गया सुर्खियों में

हर किसी का सपना होता है कि वो अच्‍छी तरह से पढ़ाई कर ले, व्‍यावसायिक डिग्री हासिल करके अच्‍छी नौकरी प्राप्‍त कर ले। यदि आप औसतन देखें तो हर दूसरे छात्र का सपना होता है कि उसे इंजीनियर बनना है, सभी को ऐसा लगता है कि इंजीनियर बनने के बाद लाइफ सेट है। लोगों की खेती-बाड़ी में कोई दिलचस्‍पी नहीं होती है क्‍योंकि उनका मानना है कि इसमें मेहनत ज्‍यादा और कमाई कम होती है। पर हम आपको आज एक ऐसे व्‍यक्ति के बारे में बताएंगे जिन्‍होंने 24 लाख सलाना के पैकेज को नकार दिया और वो अपने गांव वापस आ गए और खेती का काम करना शुरु कर दिया।

छत्‍तीसगढ़ के हैं रहने वाले

छत्‍तीसगढ़ के हैं रहने वाले

सचिन काले, छत्‍तीसगढ़ के बिलासपुर जिले के मेधपुर गांव के निवासी हैं। उन्‍होंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और उन्‍हें गुरुग्राम में अच्‍छी नौकरी प्राप्‍त हुई। लेकिन उन्‍हें संतोष नहीं मिला और वो वापस अपने गांव आ गए।

इनोवेटिव एग्रीलाईफ सॉल्यूशंस प्राइवेट लिमिटेड की शुरुआत

इनोवेटिव एग्रीलाईफ सॉल्यूशंस प्राइवेट लिमिटेड की शुरुआत

सचिन ने अनुबंध आधारित खेती में काफी शोध किया और आखिरकार 2014 में अपनी कंपनी 'इनोवेटिव एग्रीलाईफ सॉल्यूशंस प्राइवेट लिमिटेड' शुरु की। यह कंपनी ऐसे किसानों की सहायता करती है जो अनुबंध के आधार पर खेती करना चाहते हैं। अपने व्यावसायिक तरीकों का इस्तेमाल करते हुए, उन्होंने कृषि सलाहकारों को काम के लिए रखा और उन्हें प्रशिक्षण देकर अपना व्यवसाय बढ़ाना शुरू कर दिया।

किसी और काम नहीं खुद का काम करना चाहते थे

किसी और काम नहीं खुद का काम करना चाहते थे

भारत के अधिकांश मध्यम वर्ग के परिवारों की तरह, सचिन के माता-पिता भी उन्हें एक इंजीनियर बनना चाहते थे। उन्होंने अपने माता-पिता के सपनों को पूरा करने के लिए वर्ष 2000 में नागपुर में एक इंजीनियरिंग कॉलेज में मैकेनिकल इंजीनियरिंग ब्रांच में दाखिला लिया। इसके बाद, उन्‍होंने एमबीए भी किया। इसके बाद, उन्‍हें अच्‍छी नौकरी मिल गई। पर पढ़ने की चाह में उन्‍होंने पीएचडी की डिग्री भी डेवलेपमेंट इकोनॉमिक्‍स में 2007 में प्राप्‍त की। इस दौरान, उन्‍हें एहसास हुआ कि कहीं और नौकरी करने से अच्‍छा है कि वो अपना खुद का कार्य शुरू करें।

दादा जी से हुए प्रेरित

दादा जी से हुए प्रेरित

जब सचिन ने अपना खुद का व्यवसाय शुरु करने का फैसला किया, तो उनके मन में कई सारे विचार उमड़ते रहते थे। तभी उनके मन में उनके दादा जी के बारे में विचार आया कि किस तरह वो सरकारी नौकरी में कार्यरत थे। सेवानिवृत्ति के बाद, उन्‍होंने कैसे खेती का काम किया। उन्‍हें अपने दादा की बात याद आई कि खाने के बिना कोई नहीं जी सकता है और हर किसी को भोजन की जरुरत ही पड़ती है।

मजदूरों को भी दिलाया रोजगार

मजदूरों को भी दिलाया रोजगार

सचिन के पास कुछ जमीन थी लेकिन उन फसलों के ज्ञान की कमी थी, जो उन्हें अधिकतम लाभ अर्जित करने में मदद करेंगी। खेती में कुछ समय के निवेश के बाद, उन्होंने महसूस किया कि यहां की मुख्य समस्या मजदूरों की है। नौकरी की तलाश में अपने गांव के मजदूर, देश के विभिन्न स्थानों पर जाते हैं। उसने सोचा कि अगर वह मजदूरों को यहीं नौकरी मुहैया करा सकें, तो उन्हें बाहर जाने की ज़रूरत नहीं होगी। हालांकि, उनके सपने बड़े थे और जल्द ही उन्होंने किसानों के बारे में भी सोचना शुरू कर दिया। उन्होंने किसान की जमीन किराए पर ली और खेती शुरू करना शुरू कर दिया। उन्‍होंने इस काम में बहुत प्रयास किया और इसमें 15 साल की जोड़ी हुई बचत भी लगा दी।

हर साल 2 करोड़ रुपए का टर्नओवर

हर साल 2 करोड़ रुपए का टर्नओवर

सचिन इस काम को पूरी तरह से सफल बनाना चाहते थे और वो किसी भी कीमत पर समझौता नहीं करना चाहते थे। उन्‍होंने सोचा कि अगर वो इसमें सफल नहीं हुए तो उन्‍हें अपने कॅरियर में बड़ा झटका लगेगा। पर ऐसा नहीं हुआ, उनकी सफलता रंग लाई। वर्तमान में सचिन की कम्‍पनी का टर्नओवर हर साल 2 करोड़ रुपए है। इनके यहां लगभग 137 किसान काम करते हैं।

BSE में सूचीबद्ध करने का लक्ष्‍य

BSE में सूचीबद्ध करने का लक्ष्‍य

उनकी पत्नी कल्याणी भी उनके साथ काम करती है। वह जनसंचार में शिक्षित हैं और कम्‍पनी के वित्‍तीय विभाग का प्रबंधन करती हैं। सचिन का सपना है कि उनकी कंपनी को एक दिन बीएसई में सूचीबद्ध कर दिया जाये।

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