नई दिल्ली। भारत में महिलाएं चाहे जितने आधुनिक कपड़े पहन लें, लेकिन उनका साड़ी से प्रेम किसी से छिपा नहीं है। यही कारण है कि आज भी देश के अनेक हिस्सों में विशेष साड़ियां तैयार की जाती हैं। इन साड़ियों की मांग इतनी होती है कि यह हाथों-हाथ बिक जाती हैं। यही कारण है कि इन साड़ियों का प्रचार प्रसार ज्यादा नहीं दिखता है, लेकिन होती है काफी खास हैं। आइये जानते हैं कि भारत की महान सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा हथकरघा में ऐसी साड़ियां कहां तैयार होती हैं।
भारत का हर कोना इस स्वदेशी यंत्र की अलग किस्म की बुनाई और इस पर तैयार पहनावे की कहानी कहता है। हमारे यहां करीब 60 तरह के बुनाई के पैटर्न हैं जो सिर्फ ग्रामीण भारत से आते हैं। यहां सामान्य रूप से दिखने वाली गोटा-पट्टी, हाफ-साड़ी, सजीले घाघरों और चादरों से आगे भी बहुत कुछ बढ़िया है। 77 सालों की विरासत वाली कंपनी ग्रीनवे के मैनेजिंग पार्टनर ने उन पांच राज्यों को चिन्हित किया है, जहां से आप उम्दा किस्म की 5 गज वाली साड़ियां खरीद सकते हैं।
अपनी गोल्ड टोन और शानदार कढ़ाई के लिए जानी जाने वाली मूंगा सिल्क एक समय सिर्फ राजशाही परिवारों के लिए होती थी। एंथेरा असमेंसिस नाम के ये सिल्कवर्म सोम और सोआलु नामक पेड़ पर पलते हैं और इनसे जो रेशमी धागे प्राप्त होते हैं, वे काफी मजबूत होते हैं। इससे बने कपड़े की चमक हर धुलाई के बाद और बढ़िया होती रहती है।
एक कहावत के अनुसार, कांची सिल्क के जुलाहा ऋषि मरक डेय के रिश्तेदार हैं जो भगवान के जुलाहे कहे जाते हैं। वे कमल की डंठल के रेशों से कपड़ा बनाते थे। ये मलबरी सिल्क कहलाते हैं, जो दक्षिण भारत और गुजरात से संबंध रखता है। इसके बने बॉडर्र की शेड और पैटर्न इसे बाकी सबसे अलग बनाता है। कांचीपुरम सिल्क इसके विषम बॉर्डर पर बनीं पट्टियां और फूलों की कढ़ाई इसे सबसे खास बनाती है।
जब भारत के सुंदर कपड़ों और साड़ियों की बात की जाती है तो मैसूरिया मलमल और कोटा डोरिया इसकी डिजाइन की वजह से पहचाना जाता है, जिसे खत कहते हैं। शुद्ध कॉटन और सिल्क साड़ियों की इतनी रेंज हर किसी के दिल में खास जगह बनाती है। कोटा डोरिया हथकरघा साड़ी को इसकी बनावट इसे दूसरे करघों पर तैयार साड़ियों से अलग पहचान देती है।
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