अक्सर लोग घर से होने वाली रेंटल इनकम पर टैक्स की बात को नजरअंदाज कर देते हैं। लेकिन नियम के मुताबिक, किराए से होने वाली यह कमाई 'Income from House Property' के दायरे में आती है। चाहे आपको किराया कैश में ही क्यों न मिल रहा हो, इसे घोषित करना जरूरी है। अगर आप इस कमाई को छिपाते हैं, तो इनकम टैक्स विभाग आप पर भारी जुर्माना लगा सकता है। इन नियमों को समझकर आप न केवल टैक्स बचा सकते हैं, बल्कि कानूनी पचड़ों से भी दूर रहेंगे।

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टैक्सेबल रेंट की गणना करना काफी आसान है। सबसे पहले अपनी 'Gross Annual Value' (GAV) तय करें, फिर इसमें से उस वित्तीय वर्ष में चुकाए गए म्युनिसिपल टैक्स को घटा दें। इससे आपको 'Net Annual Value' (NAV) मिल जाएगी। इनकम टैक्स विभाग इस पर सीधे 30 प्रतिशत का 'स्टैंडर्ड डिडक्शन' देता है। यह छूट घर की मरम्मत और रखरखाव के लिए मिलती है, चाहे आपने वास्तव में उस पर कुछ खर्च किया हो या नहीं।

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रेंटल इनकम पर ऐसे बचाएं ज्यादा से ज्यादा टैक्स

अगर आपने घर के लिए होम लोन लिया है, तो आप अपनी टैक्स देनदारी और भी कम कर सकते हैं। सेक्शन 24(b) के तहत, किराए पर दी गई प्रॉपर्टी के होम लोन ब्याज पर पूरी छूट का दावा किया जा सकता है। हालांकि, आप एक साल में अधिकतम ₹2 लाख तक का ही घाटा (loss) सेट-ऑफ कर सकते हैं। अगर नुकसान इससे ज्यादा है, तो उसे अगले आठ असेसमेंट इयर्स तक कैरी फॉरवर्ड किया जा सकता है। यह नियम रियल एस्टेट में निवेश करने वालों के लिए काफी फायदेमंद साबित होता है।

विवरणउदाहरण (₹)
कुल सालाना किराया (GAV)5,00,000
चुकाया गया म्युनिसिपल टैक्स20,000
नेट एनुअल वैल्यू (NAV)4,80,000
स्टैंडर्ड डिडक्शन (30%)1,44,000
टैक्सेबल रेंटल इनकम3,36,000

रेंटल इनकम पर टैक्स: पेनाल्टी और नियमों का रखें ध्यान

टैक्स विभाग की कार्रवाई से बचने के लिए नियमों का पालन करना बेहद जरूरी है। अगर आपका किरायेदार हर महीने ₹50,000 से ज्यादा रेंट देता है, तो उसे TDS काटना अनिवार्य है, जो आपके फॉर्म 26AS में दर्ज होता है। हमेशा रेंट एग्रीमेंट में लिखे गए सही किराए की ही जानकारी दें। अगर रेंट एग्रीमेंट और आपके द्वारा घोषित आय में अंतर मिलता है, तो आपको स्क्रूटनी नोटिस मिल सकता है या कम इनकम दिखाने के जुर्म में भारी जुर्माना भरना पड़ सकता है।

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स्मार्ट टैक्स प्लानिंग के लिए प्रॉपर्टी से जुड़े सभी खर्चों का सटीक रिकॉर्ड रखें। सभी वैध डिडक्शन का लाभ उठाने के लिए अपना इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) हमेशा समय पर फाइल करें। सही रिपोर्टिंग से आप बिना किसी मानसिक तनाव के अपना रियल एस्टेट पोर्टफोलियो बढ़ा सकते हैं। अगर प्रॉपर्टी को-ओन्ड (co-owned) है, तो जटिलताओं से बचने के लिए किसी एक्सपर्ट की सलाह जरूर लें। नियमों के प्रति अपडेट रहकर आप अपनी वित्तीय सेहत और भविष्य की पूंजी दोनों को सुरक्षित रख सकते हैं।