RBI की मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) की बैठक 3 से 5 अगस्त तक होने वाली है, जिसके नतीजे 5 अगस्त को आएंगे। जून में ब्रेक के बाद फिलहाल रेपो रेट 5.25 प्रतिशत पर बरकरार है। पॉलिसी वाले इस हफ्ते में हर निवेशक की नजर इस बात पर है कि अपना पैसा कहां पार्क करना सही रहेगा। अगर आप भी भारतीय बचतकर्ता हैं, तो आइए फिक्स्ड डिपॉजिट (FD), रिकरिंग डिपॉजिट (RD), SIP और डेट फंड्स के नजरिए से निवेश के बेहतर विकल्पों को समझते हैं।

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अगर ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं होता है, तो शॉर्ट-टर्म यील्ड ट्रेजरी-बिल (T-bill) के कट-ऑफ के आसपास ही रहेगी। लेकिन अगर दरों में कटौती होती है, तो ड्यूरेशन फंड्स की NAV, ओवरनाइट या लिक्विड फंड्स के मुकाबले तेजी से बढ़ेगी। FD की दरें बदलने में थोड़ा वक्त लगता है, इसलिए अगर आप मौजूदा दरों को लॉक करना चाहते हैं, तो टाइमिंग का सही चुनाव बेहद जरूरी है। लिक्विड, अल्ट्रा-शॉर्ट और शॉर्ट-ड्यूरेशन फंड्स पर ब्याज दरों के उतार-चढ़ाव का असर अलग-अलग होता है।

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RBI MPC: पॉलिसी वाले हफ्ते में कहां रखें अपना पैसा?

अवधिउत्पादजोखिमतरलताकर के बाद
0–6 माहFD / Liquid या Ultra‑Short FundFD: दर स्थिर; Funds: कम ब्याज‑जोखिमFD: ब्रेक‑पेनल्टी; Funds: T+0/T+1FD/RD: स्लैब; Debt MF: स्लैब*
6–18 माहRD / Short‑Duration FundRD: दर स्थिर; Funds: अवधि‑जोखिम मध्यमRD: किस्त अनुशासन; Funds: T+1/T+3RD: स्लैब; Debt MF: स्लैब*

0 से 6 महीने के लिए आप शॉर्ट-टर्म FD और लिक्विड या अल्ट्रा-शॉर्ट फंड्स के बीच तुलना कर सकते हैं। फंड्स में आपको T+0 या T+1 (यानी तुरंत या एक दिन में) पैसा निकालने की सुविधा मिलती है, लेकिन इनकी NAV में बदलाव संभव है। वहीं, FD को समय से पहले तोड़ने पर बैंक दोहरी मार लगा सकते हैं: एक तो लागू ब्याज दर कम हो जाती है और ऊपर से अलग से पेनल्टी भी लगती है। इसलिए FD तोड़ने से पहले अपने बैंक के नियम और चार्जेस की लिस्ट जरूर चेक कर लें।

FD vs RD vs SIP vs डेट फंड: टैक्स और ब्याज दरों की पूरी तस्वीर

निवेश का जरियाअनुमानित दरस्रोत
पॉलिसी रेपो5.25%RBI डैशबोर्ड
91‑दिन T‑bill कट‑ऑफ≈5.25%RBI डैशबोर्ड
बैंक टर्म डिपॉजिट >1 साल6.00–6.60%RBI डैशबोर्ड

1 अप्रैल, 2023 या उसके बाद खरीदे गए डेट म्यूचुअल फंड पर अब आपके टैक्स स्लैब के हिसाब से टैक्स लगता है। स्कीम के खुलासे के मुताबिक, 12 महीने से ज्यादा समय तक रखे गए लिस्टेड म्यूचुअल फंड यूनिट्स पर बिना इंडेक्सेशन के 12.5 प्रतिशत लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स लगता है। FD और RD से मिलने वाले ब्याज पर भी स्लैब के हिसाब से टैक्स लगता है और सेक्शन 194A के तहत TDS कटता है। हालांकि, सीनियर सिटीजंस को बैंक ब्याज पर टैक्स छूट की ज्यादा सीमा मिलती है।

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पॉलिसी वाले हफ्तों में एक साथ सारा पैसा (Lump-sum) लगाने के बजाय SIP के जरिए धीरे-धीरे निवेश करना बाजार के जोखिम को कम करने में मदद करता है। 6 से 18 महीने के लिए RD में ब्याज दर की निश्चितता मिलती है, जबकि शॉर्ट-ड्यूरेशन फंड्स में टैक्स के मामले में लचीलापन तो है, लेकिन बाजार के उतार-चढ़ाव का असर भी रहता है। पैसा कहीं भी शिफ्ट करने से पहले FD के नियम, फंड का रिस्क, क्रेडिट क्वालिटी, एक्सपेंस रेशियो और अपने इमरजेंसी फंड की जरूरतों को अच्छी तरह परख लें।