Homebuying: Covid19 के बाद भारत में आम लोगों की Financial Priorities काफी बदल गई हैं। महंगाई, नौकरी की अनिश्चितता और बढ़ती होम लोन ब्याज दरों के बीच अब घर खरीदने का फैसला पहले से कहीं ज्यादा सोच-समझकर लेना पड़ता है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर किसी के पास ₹10 लाख से ₹30 लाख तक की बचत है, तो उसे कितने बजट का घर खरीदना चाहिए?

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GoodReturns से खास बातचीत में Great Value Capital के Executive Director Shubhodeep Das ने इसी सवाल का विस्तार से जवाब दिया और बताया कि घर खरीदते समय सिर्फ प्रॉपर्टी की कीमत नहीं, बल्कि आपकी Income, कैश फ्लो और भविष्य की वित्तीय स्थिति भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है।

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घर खरीद रहे हैं या निवेश कर रहे हैं?

शुबोदीप दास के मुताबिक, घर खरीदने और रियल एस्टेट में निवेश करने का उद्देश्य अलग-अलग होता है। अगर आप अपने परिवार के रहने के लिए घर खरीद रहे हैं, तो उसे एक लॉन्ग टर्म एसेट की तरह देखें। वहीं अगर मकसद निवेश है, तो खरीद और बिक्री की रणनीति अलग होगी।

उनका कहना है कि किसी भी व्यक्ति को अपनी पूरी संपत्ति केवल रियल एस्टेट में नहीं लगानी चाहिए। पोर्टफोलियो में विविधता (Diversification) बनाए रखना जरूरी है।

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₹10-30 लाख की बचत, कितना महंगा घर खरीदें?

एक्सपर्ट के अनुसार, घर खरीदते समय अपनी कुल बचत को डाउन पेमेंट के रूप में पूरी तरह इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।

अगर आपके पास लगभग ₹30 लाख की बचत है, तो आदर्श रूप से ₹90 लाख से ₹1 करोड़ तक की प्रॉपर्टी पर विचार किया जा सकता है। इसकी वजह यह है कि प्रॉपर्टी खरीदने के बाद कई अतिरिक्त खर्च भी सामने आते हैं।

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प्रॉपर्टी की कीमत के साथ आते हैं ये खर्चे

घर खरीदते समय केवल फ्लैट की कीमत का हिसाब लगाना बड़ी गलती हो सकती है। वास्तविक खर्च में कई अन्य भुगतान भी शामिल होते हैं।

इनमें शामिल हैं-

* GST (यदि लागू हो)
* स्टाम्प ड्यूटी
* रजिस्ट्रेशन चार्ज
* ब्रोकरेज
* होम लोन प्रोसेसिंग फीस
* अन्य कानूनी और प्रशासनिक शुल्क

यानी यदि किसी प्रॉपर्टी की एग्रीमेंट वैल्यू 100 रुपये है, तो वास्तविक खर्च लगभग 110 से 115 रुपये तक पहुंच सकता है।

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कितना करें Downpayment?

हालांकि कई बैंक और हाउसिंग फाइनेंस कंपनियां 10-15% डाउन पेमेंट पर भी लोन दे देती हैं, लेकिन एक्सपर्ट का मानना है कि खरीदार को 20% से 30% तक अपनी हिस्सेदारी रखनी चाहिए। इससे EMI का बोझ कम रहता है और ब्याज का कुल खर्च भी घटता है।

EMI आपकी सैलरी का कितना हिस्सा हो?

शुबोदीप दास का कहना है कि होम लोन की EMI तय करते समय केवल बैंक की पात्रता (Eligibility) नहीं देखनी चाहिए।

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उनके अनुसार-

* टैक्स कटने के बाद मिलने वाली Net Take Home Income को आधार बनाएं।
* अन्य सभी मौजूदा लोन और जरूरी खर्च निकालने के बाद बची राशि का केवल **30% से 40%** हिस्सा ही होम लोन EMI होना चाहिए।
* इससे भविष्य में वित्तीय दबाव कम रहेगा।

पूरी क्षमता का लोन लेना सही नहीं

एक्सपर्ट ने चेतावनी दी कि कई लोग बैंक जितना अधिकतम लोन देता है, उतना पूरा लोन ले लेते हैं। इसके लिए वे अपनी FD तोड़ देते हैं, इंश्योरेंस सरेंडर कर देते हैं और सारी बचत खत्म कर देते हैं। ऐसी रणनीति भविष्य में जोखिम बढ़ा सकती है।

ब्याज दर बढ़ने का असर समझना जरूरी

उन्होंने याद दिलाया कि कोविड के बाद होम लोन की ब्याज दरें करीब **7.75% से बढ़कर 11%** तक पहुंच गई थीं। इससे लाखों लोगों की EMI बढ़ी और कई मामलों में लोन की अवधि भी लंबी हो गई।

इसलिए घर खरीदते समय यह मानकर चलना चाहिए कि भविष्य में ब्याज दरें बढ़ सकती हैं।

घर खरीदने से पहले इन सवालों के जवाब जरूर तलाशें-

* क्या मेरी आय अगले 5 साल तक स्थिर रहेगी?
* अगर ब्याज दर बढ़ी तो क्या मैं EMI चुका पाऊंगा?
* क्या मेरे पास इमरजेंसी फंड बचा रहेगा?
* क्या घर खरीदने के बाद भी मेरी बाकी निवेश योजनाएं जारी रहेंगी?

शुबोदीप दास के मुताबिक, घर खरीदना जीवन का सबसे बड़ा वित्तीय फैसला होता है। इसलिए सिर्फ बैंक जितना लोन दे रहा है या जितनी बड़ी प्रॉपर्टी खरीद सकते हैं, उसी आधार पर निर्णय नहीं लेना चाहिए। घर हमेशा अपनी आय, बचत, भविष्य के कैश फ्लो और अतिरिक्त खर्चों को ध्यान में रखकर खरीदें। सही बजट, संतुलित डाउन पेमेंट और नियंत्रित EMI ही आपको लंबे समय तक वित्तीय रूप से सुरक्षित रख सकती है।