भारतीय शेयर बाजार में 26 मई को एक बड़ी गिरावट देखने को मिली। बाजार में यह हलचल ठीक उसी समय हुई जब भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने मानसून को लेकर अपना ताजा अपडेट जारी किया। ऐसे में कई निवेशक अब इक्विटी और डेट इंस्ट्रूमेंट्स के बीच अपने पोर्टफोलियो को फिर से बैलेंस करने में जुट गए हैं। बाजार के इस उतार-चढ़ाव भरे दौर में जोखिम को कम करने के लिए फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) और ट्रेजरी बिल (T-Bills) के बीच सही चुनाव करना अब बेहद जरूरी हो गया है।

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बाजार में बार-बार होने वाले उतार-चढ़ाव की वजह से अक्सर निवेशक गोल्ड या डेट फंड्स जैसे सुरक्षित विकल्पों का रुख करते हैं। हालांकि, सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (SIP) लंबी अवधि में ग्रोथ का मौका देते हैं, लेकिन आज जैसी गिरावट खरीदारी के लिए एक बेहतरीन एंट्री पॉइंट भी साबित हो सकती है। मानसून की रफ्तार का सीधा असर आने वाले समय में महंगाई के आंकड़ों और सेंट्रल बैंक की पॉलिसी दरों पर पड़ेगा। ऐसे में समझदार निवेशक बैंक डिपॉजिट और डिजिटल गोल्ड जैसे विकल्पों में लिक्विडिटी और रिटर्न के बीच तालमेल बिठाने की कोशिश कर रहे हैं।

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FD vs SIP vs गोल्ड vs T-Bills: स्थिरता के लिए कौन सा विकल्प है बेहतर?

जो निवेशक तीन महीने की अवधि के लिए सुरक्षा चाहते हैं, वे अक्सर बैंक डिपॉजिट के मुकाबले ट्रेजरी बिल (T-Bills) को ज्यादा पसंद करते हैं। इन सरकारी सिक्योरिटीज पर मिलने वाला रिटर्न फिलहाल कई रिटेल सेविंग्स रेट्स से बेहतर है। बैंक डिपॉजिट के उलट, इनमें लिक्विडिटी ज्यादा होती है और पूरी तरह से सरकारी गारंटी (Sovereign Guarantee) मिलती है। 91 से 364 दिनों के लिए सुरक्षित तरीके से पैसा पार्क करने के लिए यह एक आइडियल विकल्प है।

एसेट क्लासअनुमानित रिटर्न %जोखिम का स्तर
T-Bills (364 दिन)6.85% - 7.15%बहुत कम
बैंक FD (1 साल)6.50% - 7.50%कम
गोल्ड (लंबी अवधि)8.00% - 11.00%सामान्य

मीडियम टर्म के लिए डायवर्सिफाइड म्यूचुअल फंड्स में SIP एक मजबूत विकल्प बना हुआ है। आज जैसे उतार-चढ़ाव वाले सत्रों के दौरान ये निवेश की लागत को औसत (average out) करने में मदद करते हैं। वहीं, मानसून की अनिश्चितता के बीच महंगाई से बचाव के लिए गोल्ड एक बेहतरीन हेज के रूप में काम करता है। बेहतर सुरक्षा और सुविधा के लिए आप सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड (SGB) या ETF का इस्तेमाल कर सकते हैं।

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मौजूदा टैक्स व्यवस्था का आपकी वास्तविक कमाई पर काफी असर पड़ता है। अब डेट फंड्स पर टैक्स आपकी इनकम टैक्स स्लैब दरों के हिसाब से लगता है। इस बदलाव की वजह से आज हर भारतीय निवेशक के लिए टैक्स-एफिशिएंट प्लानिंग करना बहुत जरूरी हो गया है। एक बैलेंस पोर्टफोलियो ही आपको ग्लोबल मार्केट के उतार-चढ़ाव और घरेलू आर्थिक बदलावों के बीच मजबूती से टिकाए रख सकता है।