24 जुलाई को शेयर बाजार में लगातार पांचवें दिन गिरावट रही, जिससे निवेशकों का भरोसा डगमगा गया है। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और ग्लोबल मार्केट में बढ़ते जोखिम के बीच बेंचमार्क इंडेक्स नीचे गिरे हैं। ऐसे में निवेशक अब सुरक्षित माने जाने वाले डेट फंड्स (Debt Funds) का रुख कर रहे हैं। हालांकि, बाजार में उतार-चढ़ाव की वजह से कैश मैनेजमेंट थोड़ा मुश्किल हो गया है। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि जोखिम को कम रखते हुए अपनी जरूरत के हिसाब से कौन सा डेट फंड चुना जाए?
निवेश की प्लानिंग 'बकेट' (Buckets) के हिसाब से करें। अगर आप 0-3 महीने के लिए पैसा लगाना चाहते हैं, जहां आपको तुरंत पैसे की जरूरत पड़ सकती है और जोखिम कम चाहिए, तो ओवरनाइट या लिक्विड फंड्स बेहतर हैं। 3-12 महीने के लिए मनी मार्केट या अल्ट्रा-शॉर्ट फंड्स सही रहेंगे। वहीं, 1-3 साल के नजरिए से शॉर्ट-ड्यूरेशन फंड्स और टारगेट मैच्योरिटी फंड्स के बीच चुनाव किया जा सकता है। अगर आप 5 साल से ज्यादा समय के लिए निवेश करना चाहते हैं, तो गिल्ट फंड्स (Gilt Funds) पर विचार करें, लेकिन यहां उतार-चढ़ाव के लिए तैयार रहना होगा।
लिक्विड बनाम मनी मार्केट बनाम टारगेट मैच्योरिटी बनाम गिल्ट फंड
जब बाजार में घबराहट हो, तो पैसे की उपलब्धता (Liquidity) सबसे ज्यादा मायने रखती है। कई लिक्विड स्कीम्स में T+0 यानी उसी दिन पैसे निकालने की सुविधा मिलती है (अधिकतम 50,000 रुपये या 90% तक)। बाकी मामलों में लिक्विड या ओवरनाइट फंड्स के लिए T+1 और अन्य डेट फंड्स के लिए T+2 का समय लगता है। ध्यान रहे कि लिक्विड फंड्स में शुरुआती 7 दिनों के भीतर पैसे निकालने पर 'एग्जिट लोड' देना पड़ता है। नीचे दी गई टेबल में संभावित रिटर्न की जानकारी दी गई है।
| कैटेगरी | संभावित दर/यील्ड (जुलाई 2026, टैक्स से पहले) |
|---|---|
| लिक्विड/ओवरनाइट फंड्स | ~5.2%–5.3% (रेपो कॉरिडोर के करीब) |
| मनी मार्केट/अल्ट्रा-शॉर्ट | ~7.1%–8.0% (CD/CP, 3–12 महीने) |
| शॉर्ट-ड्यूरेशन (1–3 साल) | ~7.8%–8.1% (AAA, 1–3 साल) |
| टारगेट मैच्योरिटी (3–5 साल G-Sec/SDL) | ~6.5%–6.9% (मैच्योरिटी तक रखने पर) |
| गिल्ट फंड्स (10 साल का एंकर) | ~7.0% मौजूदा बेंचमार्क |
| बड़े बैंकों की FD (1–3 साल) | ~6.25%–6.75% |
| स्मॉल फाइनेंस बैंक FD | ~8.1% तक |
2023 के बाद टैक्स और एग्जिट लोड के नए नियम
1 अप्रैल, 2023 या उसके बाद खरीदे गए ज्यादातर डेट फंड्स अब 'स्पेसिफाइड म्यूचुअल फंड्स' की कैटेगरी में आते हैं। अब इनमें होने वाले मुनाफे पर आपके इनकम टैक्स स्लैब के हिसाब से टैक्स लगता है और इंडेक्सेशन का फायदा नहीं मिलता, चाहे आप इसे कितने भी समय तक होल्ड करें। डिविडेंड पर भी इनकम की तरह ही टैक्स लगेगा। एग्जिट लोड हर स्कीम का अलग हो सकता है, लेकिन लिक्विड फंड्स में 7 दिनों तक यह अनिवार्य है। इसलिए अपने कैश फ्लो की प्लानिंग सोच-समझकर करें।
क्रेडिट और ड्यूरेशन रिस्क: क्या करें और क्या न करें
ज्यादा रिटर्न के चक्कर में कमजोर क्रेडिट क्वालिटी वाले फंड्स चुनना भारी पड़ सकता है, खासकर तब जब मार्केट में लिक्विडिटी कम हो। हमेशा हाई-क्वालिटी और डायवर्सिफाइड पोर्टफोलियो को प्राथमिकता दें। निवेश से पहले फैक्टशीट में क्रेडिट मिक्स और मैकाले ड्यूरेशन (Macaulay duration) जरूर चेक करें। ड्यूरेशन बढ़ने से मार्केट के उतार-चढ़ाव का असर ज्यादा होता है। टारगेट मैच्योरिटी फंड्स आपकी भविष्य की जरूरतों को पूरा करने में मददगार हो सकते हैं, लेकिन इसके लिए अनुशासन जरूरी है। याद रखें, बाजार में ज्यादा दबाव होने पर SEBI के नियमों के तहत स्कीम्स रिडेम्पशन पर अस्थायी रोक लगा सकती हैं, इसलिए इमरजेंसी के लिए कुछ फंड हमेशा अलग रखें।
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