2007-08 के दौरान मंदी का दौर तो आपको याद ही होगा। उस दौरान दुनिया भर के बाजार गोता लगा रहे थे। 2016 की शुरुआत में हेज एंड फर्म सॉरोस फंड मैनेजमेंट के चेयरमैन और अरबपति जॉर्ज सॉरोस ने कहा कि 2016 में 2008 की मंदी जैसे हालात बंन रहे हैं।

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ये घटनाएं डाल सकती हैं असर

ग्लोबल शेयर मार्केट और भारतीय शेयर बाजार में इन दिनों उठा-पटक का दौर चल रहा है। हाल ही में सेंसेक्स में एक ही दिन में करीब 500 अंको की गिरावट दर्ज की गई। ऐसे वैश्विक बाजार में अस्थिरता के चलते हुआ। बाजर का विशेषज्ञों के मुताबिक आने वाले वक्त में कुछ ऐसे वैश्विक घटनाएं हैं जो भारत समेत दुनिया भर के बाजार पर असर डाल सकते हैं।

अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव

पिछले एक वर्ष से अमेरिका में राष्ट्रपति चुनावों के लिए चुनाव प्रचार जारी है। अमेरिकी राष्ट्रपति पद के उम्मीद्वार डोनाल्ड ट्रंप भारतीय युवाओं पर अमेरिका के युवाओं की नौकरियां छीनने जैसा बयान दे चुके हैं। ऐसे बयान से विदेशी निवेश पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। अगर बात करें तो हम देख सकते हैं कि 2014 के बाद से भारत और अमेरिका के बीच व्यापार बहुत तेजी से बढ़ा है। एफडीआई के जरिए अमेरिका ने भारत में बड़ा निवेश किया है। ऐसे में अमेरिकी राष्ट्रपति के चुने जाने के बाद बाजार पर बड़ा असर पड़ सकता है।

अस्थिर यूरोपय बाजार

हाल ही में ब्रिटेन यूरोपीय यूनियन से अलग हो गया। यूरोप में जर्मनी के बाद ब्रिटेन दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है ऐसे में ब्रिटेन का यूरोपीय यूनियन छोड़ना बाजार पर दूरगामी असर डाल सकता है। यूरोप के बैंको की हालत इस वक्त बेहद खराब है। यूरोजोन के बैंको का एनपीए करीब 9000 अरब यूरो पहुंच चुका है जिससे इन बैंको के पास लिक्विडिटी (तरल मुद्रा) की कमी हो गयी है जो कि खतरे का संकेत है। यूरोप में वित्तीय अस्थिरता का असर भारतीय बाजर पर भी पड़ सकता है।

कमजोर हो रहा है चीन

अपनी मजबूत अर्थ व्यवस्था के लिए जाने जाना वाला चीन ग्लोबल मंदी के खतरे से डर हुआ है। चीन ने 2015 में अपनी अर्थव्यवस्था को बनाए रखने के लिए अपनी मुद्रा युआन का अवमूल्यन किया है। इससे चीन की अर्थ व्यवस्था में सुधार तो हुआ लेकिन वैश्विक बाजारों पर नकारात्मक असर पड़ा है। अगर मंदी का दौर फिर से आया और चीन ने दोबार अपनी मुद्रा का अवमूल्यन किया तो ये खतरा भारत समेत दुनिया भर के बाजारों को हिला सकता है।

विकसित देशों के बैंको का रिव्यू

आने वाले वक्त में विकसित देशों के केंद्रीय बैंक अपनी मॉनिटरिंग पॉलिसी का रिव्यु कर करेंगे। अमेरिकी फेडरल बैंक और यूरोप के बैंक भी रिव्यू करेंगे हो सकता है कि इस रिव्यू में वह अपनी ब्याज दरों में बदलाव करें और ब्याज दरें बढ़ा दें। यदि ऐसा हुआ तो भारत में निवेश करने वाली अमेरिकी कंपनिया और विदेश निवेशक बाजार से अधिक से अधिक अपना पैसा निकाल सकते हैं जिससे बाजार में गिरावट आ सकती है।

संभल कर करें निवेश

ये चार कारक आने वाले समय में ग्लोबल मार्केट पर असर डाल सकते हैं। ये असर वैश्विक बाजार के अच्छा होगा या बुरा ये तो वक्त आने पर पता चलेगा लेकिन जो निवेशक इस बारे में जानते हैं या फिर जान चुके हैं उन्हें संभल कर निवेश करना होगा।