क्यों नहीं घटाई रेपो दर
आरबीआई को अन्य सरकारी बैंकों में रखी वित्तीय साख के बर्बाद होने की आशंका रहती है। क्योंकि महंगाई एक ऐसी स्थिति है जब हर एक व्यक्ति के पास रखी बचत खत्म होने लगती है। उसकी आय तो उतनी रहती है लेकिन खर्च में बढ़ोतरी होती है। इसलिए यह गुंजाइश कम हो जाती है कि व्यक्ति लोन लेने के बाद वापस चुकता कर देगा। जिसके मद्देनजर आरबीआई काम काम है कि इस वित्तीय संकट की आशंकाओं को देखते हुए रेपो रेट, सीआरआर औऱ रिवर्स रेपो रेट को या तो स्थिर रखे या फिर इन्हें बढ़ा दे।
अभी रेपो दर 8 फीसदी, सीआरआर दर 4 फीसदी औऱ रिवर्स रेपो दर 7 फीसदी है। इन दरों को बढ़ाने से मार्केट में मनी फ्लो बढ़ ज्यादा है और लोन देने की क्षमता में बढ़ोतरी होती है वहीं इन दरों के कम होने पर मार्केट में मनी फ्लो कम हो जाता है जिससे अधिक से अधिक लोन देने की क्षमता में बढ़ोतरी हो जाती है। जिससे हर बैंक अधिक से अधिक ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए ब्याज दरों में कमी भी करती हैं।
यही मुख्य कारण होता है जब आरबीआई मौद्रिक नीति में परिवर्तन नहीं करता है। आपको बता दें कि वर्तनाम में भी हजारों-करोड़ों रुपए सरकारी बैंकों का पैसा बड़े उद्योग घरानों के पास फंसा हुआ है। जिससे पहले ही बैंकों की माली हालत है। जिससे छोटा सा भी रिस्क आरबीआई नहीं लेना चाहता।
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