Bab al-Mandeb Strait: दुनिया भर में ऊर्जा की सप्लाई और समुद्री व्यापार को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच, यमन ने रणनीतिक रूप से अहम 'बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य' (Bab al-Mandeb Strait) को बंद करने की धमकी दी है। इस कदम से ग्लोबल शिपिंग में रुकावट आ सकती है, तेल की कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं और भारत के व्यापारिक रास्तों पर भी असर पड़ सकता है। यह स्थिति ऐसे समय में बनी है जब मध्य पूर्व का एक और अहम ट्रांजिट रूट, होर्मुज जलडमरूमध्य, पहले से ही पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध के कारण दबाव में है।

Advertisement

यमन ने क्या कहा?

यमन के अंसारुल्लाह आंदोलन के पॉलिटिकल ब्यूरो के सदस्य मोहम्मद अल-फराह ने कहा कि अगर सऊदी अरब यमन के जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाना जारी रखता है, तो 'ऑपरेशनल अलायंस' के तहत बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य और होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद किया जा सकता है। प्रेस टीवी ने सोमवार को अल-फराह के हवाले से कहा, "अगर मौजूदा हालात और बिगड़ते हैं, तो बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य और होर्मुज जलडमरूमध्य को 'ऑपरेशनल अलायंस' के तहत बंद कर दिया जाएगा। इसके बाद तेल की कीमतें तेजी से बढ़कर 200 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं, जिससे जबरदस्त झटका लगेगा।"

Advertisement

बाब अल-मन्देब जलडमरूमध्य महत्वपूर्ण क्यों है?

अरबी में "आंसू का द्वार" या "दुख का द्वार" के रूप में जाना जाने वाला बाब अल-मंडेब अरब प्रायद्वीप और हॉर्न ऑफ अफ्रीका के बीच रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। यह लाल सागर को अदन की खाड़ी और हिंद महासागर से जोड़ता है, जिससे यह दुनिया के सबसे व्यस्त शिपिंग लेन में से एक बन जाता है। यह जलडमरूमध्य स्वेज नहर के दक्षिणी प्रवेश द्वार के रूप में भी काम करता है और वैश्विक समुद्री व्यापार का लगभग 10-12% हिस्सा वहन करता है, जिसमें दुनिया के ऊर्जा शिपमेंट का एक महत्वपूर्ण हिस्सा भी शामिल है।

Advertisement

भारत के लिए यह क्यों जरूरी है?

होर्मुज के बाद, भारत पश्चिम एशिया और उत्तरी अफ्रीका के कुछ हिस्सों से कच्चा तेल और लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) मंगाने के लिए बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य (स्ट्रेट) पर निर्भर है। यह रास्ता एक्सपोर्ट के लिए भी उतना ही जरूरी है। भारत की प्राइवेट और सरकारी रिफाइनरी कंपनियां नियमित रूप से इस रास्ते से प्रोसेस किए गए और रिफाइन किए गए पेट्रोलियम प्रोडक्ट यूरोप के खरीदारों को भेजती हैं।

Advertisement

भारत का लगभग 95% व्यापार समुद्र के रास्ते होता है। इसलिए बाब-अल-मंदेब यूरोप, उत्तरी अमेरिका और उत्तरी अफ्रीका को एक्सपोर्ट करने के लिए एक अहम रास्ता है।

स्वेज नहर और बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य मिलकर भारत के कुल विदेशी व्यापार का लगभग 35% हिस्सा संभालते हैं। इस रास्ते से बड़े पैमाने पर एक्सपोर्ट होने वाले सामान जैसे टेक्सटाइल, कपड़े, दवाएं, मशीनरी और बासमती चावल समेत कृषि उत्पाद गुजरते हैं। यूरोप जाने वाले भारत के लगभग 80% सामान का एक्सपोर्ट रेड सी (लाल सागर) इलाके से होकर होता है।

Advertisement

विभावंगल अनुकूलकरा प्राइवेट लिमिटेड के फाउंडर और मैनेजिंग डायरेक्टर सिद्धार्थ मौर्य का कहना है कि "बाब अल-मंदेब में रुकावट का भारतीय अर्थव्यवस्था पर मुख्य रूप से लॉजिस्टिक्स खर्च बढ़ने, इंपोर्टेड महंगाई और सप्लाई चेन में गड़बड़ी के तौर पर असर पड़ेगा। हालांकि भारत का ज्यादातर तेल इंपोर्ट होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से होता है, लेकिन यूरोप, उत्तरी अफ्रीका और कुछ भूमध्यसागरीय देशों के साथ स्वेज नहर के जरिए व्यापार के मामले में बाब अल-मंदेब भारत के लिए एक अहम व्यापारिक रास्ता है। वैकल्पिक 'केप रूट' से जहाजों को घुमाकर ले जाने के कारण ट्रांसपोर्टेशन की लागत और समय में बढ़ोतरी से इंपोर्ट की लागत बढ़ जाएगी और एक्सपोर्ट कम प्रतिस्पर्धी हो जाएगा। इसका भारत के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर, इंजीनियरिंग उत्पादों, केमिकल इंडस्ट्री, टेक्सटाइल इंडस्ट्री और फार्मास्युटिकल इंडस्ट्री पर बुरा असर पड़ेगा।

Advertisement

भारत की अर्थव्यवस्था के लिए कितना महत्वपूर्ण है?

VT मार्केट्स के मार्केट एनालिस्ट रुचिट ठाकुर ने कहा कि "बाब अल-मंडेब जलडमरूमध्य (स्ट्रेट) में रुकावट भारत के लिए काफी चिंता का विषय होगा, भले ही यह कोई तत्काल आपदा न हो। यह जलडमरूमध्य लाल सागर को अदन की खाड़ी से जोड़ता है और स्वेज नहर के माध्यम से एशिया और यूरोप के बीच व्यापार के लिए एक महत्वपूर्ण प्रवेश बिंदु के रूप में कार्य करता है। किसी भी लंबी रुकावट के साथ अंतरराष्ट्रीय शिपिंग की लागत, बीमा प्रीमियम, कार्गो डिलीवरी में देरी और कच्चे तेल की कीमत बढ़ सकती है।

भारत को आपूर्ति की सीधी कमी के बजाय ऊर्जा की बढ़ती लागत और मुद्रास्फीति का अधिक खतरा होगा। विनिर्माण, रसायन, लॉजिस्टिक्स और विमानन उन क्षेत्रों में से हैं जो माल ढुलाई और ईंधन की बढ़ती लागत से प्रभावित हो सकते हैं। हालांकि, भारत के विविध ऊर्जा स्रोत, रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार और विभिन्न शिपिंग मार्ग इसे अस्थायी रुकावटों के प्रति अपेक्षाकृत लचीला बनाते हैं"।

भारत अपनी ऊर्जा और व्यापारिक वस्तुओं के लिए बाब अल-मंडेब जलडमरूमध्य पर कितना निर्भर है?

रुचिट ठाकुर ने कहा कि "भारत बाब अल-मंडेब जलडमरूमध्य पर काफी हद तक निर्भर है, खासकर जब उत्तरी अफ्रीका, यूरोप और भूमध्य सागर के कुछ हिस्सों के साथ व्यापार की बात आती है। बाब अल-मंडेब स्वेज नहर से होकर जाने वाले भारत के आयात और निर्यात के एक बड़े हिस्से के लिए पहला पड़ाव है। इसमें कंटेनर-आधारित माल ढुलाई, कपड़ा, रसायन, फार्मास्यूटिकल्स और इंजीनियरिंग सामान शामिल हैं।

ऊर्जा के मामले में, भारत की प्रत्यक्ष निर्भरता यूरोप की तुलना में कम है क्योंकि इसके कच्चे तेल का अधिकांश आयात मध्य पूर्व से आता है और अक्सर अरब सागर से होकर गुजरता है। हालांकि, स्वेज मार्ग से जुड़े क्षेत्रों से तेल और पेट्रोलियम उत्पादों की शिपमेंट प्रभावित हो सकती है। भारत के ऊर्जा स्रोतों के पूरी तरह से ठप होने के बजाय, बड़ा आर्थिक प्रभाव संभवतः दुनिया भर में माल ढुलाई और तेल की कीमतों में वृद्धि से होगा"।