Trump Imposes 100% Tarrif: अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप (Trump) हर बार कुछ न कुछ नया लेकर आ रहे है पहले टैरिफ फिर जंग और फिर से टैरिफ! राष्ट्रपति ट्रंप ने गुरुवार को एक अहम एग्जीक्यूटिव ऑर्डर पर साइन किए। इस आदेश (Order) के तहत फॉर्मा कंपनियों पर 100% तक टैरिफ लगाए जाएंगे। इसमें उन फार्मा कंपनियों (Pharma Company) पर कड़ा रुख अपनाया गया है, जो अमेरिकी प्रशासन के साथ "मोस्ट फेवर्ड नेशन" (MFN) प्राइसिंग समझौता करने से इनकार करती हैं।
नई नीति (New Rule) के मुताबिक, ऐसी कंपनियों की पेटेंटेड दवाओं पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ (Tarrif) लगाया जा सकता है। ट्रंप (Trump) के इस ताजा फैसले के पीछे साफ रणनीति दिखाई देती है, दवा कंपनियों को घरेलू उत्पादन की ओर मोड़ना और अमेरिकी नागरिकों को सस्ती दवाएं उपलब्ध कराना। ट्रंप प्रशासन का मानना है कि जब तक दवाओं का उत्पादन बड़े पैमाने पर विदेशों में होता रहेगा, तब तक उनकी कीमतों को नियंत्रित करना मुश्किल रहेगा।
बातचीत के लिए दिया गया है समय-
ट्रंप (Trump) की यह सख्त नीति एक तरह से फार्मा कंपनियों (Pharma compay) पर दबाव बनाने का औजार भी है। नई व्यवस्था के तहत, जो कंपनियां "मोस्ट फेवर्ड नेशन" (MFN) प्राइसिंग डील को स्वीकार कर रही हैं और अमेरिका में उत्पादन इकाइयां स्थापित करने की दिशा में कदम बढ़ा रही हैं, उन्हें पूरी तरह से टैरिफ से छूट दी गई है। रिपोर्ट्स के अनुसार, कंपनियों को बातचीत के लिए अभी भी समय दिया गया है।
बड़ी फार्मा कंपनियों के पास 120 दिन-
बता दें कि बड़ी फार्मा कंपनियों के पास 120 दिनों का समय है, जबकि अन्य कंपनियों को 180 दिन की मोहलत दी गई है। यह आदेश ट्रंप के तथाकथित "लिबरेशन डे" की पहली वर्षगांठ पर आया है। यह वही दिन है जब उन्होंने वैश्विक आयात पर बड़े पैमाने पर टैरिफ लगाने की घोषणा की थी। हालांकि, फरवरी 2026 में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने इन टैरिफ में से कई को रद्द कर दिया था, जिनमें "लिबरेशन डे" से जुड़े प्रावधान भी शामिल थे।
स्टील, एल्युमीनियम और तांबे पर भी टैरिफ-
इसी के साथ ट्रंप ने आयातित स्टील, एल्युमीनियम और तांबे पर 50 प्रतिशत टैरिफ को लेकर भी नया अपडेट जारी किया है। अब इन धातुओं पर टैरिफ "फुल कस्टम्स वैल्यू" के आधार पर तय किया जाएगा, यानी वह वास्तविक कीमत जो अमेरिकी खरीदार विदेशी उत्पादों के लिए चुकाते हैं।
ट्रंप की नीति पड़ेगी भारी-
ट्रंप की यह नीति केवल व्यापारिक या आर्थिक निर्णय नहीं, बल्कि एक आक्रामक "अमेरिका-फर्स्ट" दृष्टिकोण का विस्तार है। सवाल यह है कि क्या यह दबाव लंबे समय में दवा कंपनियों को अमेरिका में निवेश बढ़ाने के लिए प्रेरित करेगा, या फिर वैश्विक सप्लाई चेन में अस्थिरता पैदा करेगा? इसके अलावा, यह भी ध्यान देने वाली बात है कि उत्पादन को अमेरिका में शिफ्ट करना आसान या सस्ता नहीं है। इससे कंपनियों की लागत बढ़ सकती है, जिसका असर अंत में उपभोक्ताओं पर भी पड़ सकता है यानी जिस सस्ती दवा के लक्ष्य को सामने रखा गया है, वही चुनौती बन सकता है।
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