Tata Trusts Board Meeting Postponed : सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट और सर रतन टाटा ट्रस्ट के बोर्ड की बैठक 8 मई को होने वाली थी, लेकिन इसे टाल दिया गया है। अब बड़ी कानूनी चुनौतियों के चलते 16 मई तक के लिए टाल दी गई हैं। टाटा ट्रस्ट्स की इन अहम बैठकों पर सबकी नजरें टिकी थीं, क्योंकि इनसे भारत के सबसे बड़े बिजनेस ग्रुप की भविष्य की दिशा के बारे में संकेत मिलने की उम्मीद थी। माना जा रहा था कि इन बैठकों में गवर्नेंस, बोर्ड में प्रतिनिधित्व, नेतृत्व में तालमेल और लंबे समय तक चलने वाले रणनीतिक कंट्रोल से जुड़े सवाल हावी रहेंगे। ये बैठकें उन शीर्ष परोपकारी संस्थाओं में हो रही थीं, जो टाटा संस को कंट्रोल करती हैं।

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ये मीटिंग्स टाटा ग्रुप के सबसे ऊंचे मालिकाना ढांचे के लिए एक नाज़ुक मोड़ पर हो रही हैं। टाटा ट्रस्ट्स, ग्रुप की होल्डिंग कंपनी टाटा संस को कंट्रोल करता है, और इसके नॉमिनी डायरेक्टर उन फैसलों में अहम भूमिका निभाते हैं जो भारत के सबसे बड़े ग्रुप का भविष्य तय करते हैं।

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सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट और सर रतन टाटा ट्रस्ट की बैठकें इसलिए अहम हो जाती हैं, क्योंकि ये ऐसे समय में हो रही हैं जब टाटा इकोसिस्टम के अंदर के मतभेद तेजी से लोगों के सामने आ रहे हैं। इस पर ज्यादा ध्यान जाने की तुरंत वजह बॉम्बे हाई कोर्ट का 7 मई को इन बैठकों पर रोक लगाने से इनकार करना था। दरअसल, एक कानूनी चुनौती में इन बैठकों को रोकने के लिए अंतरिम राहत मांगी गई थी। कोर्ट के दखल देने से इनकार करने के बाद, अब सारा ध्यान ट्रस्टों के अंदर होने वाली चर्चाओं पर टिक गया है।

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कानूनी विवाद की वजह क्या थी?

यह याचिका ठाणे के 61 वर्षीय निवासी सुरेश पाटिलखेड़े ने दायर की है, जिन्होंने ट्रस्ट के बोर्ड की संरचना को चुनौती दी है। इस विवाद की जड़ में 'महाराष्ट्र पब्लिक ट्रस्ट एक्ट' में 2025 में किया गया एक संशोधन है, जिसके तहत पब्लिक ट्रस्टों में "लाइफ ट्रस्टियों" की संख्या पर सीमाएं तय की गई थीं।

संशोधन के अनुसार, "धारा 30A(2) के तहत लाए गए संशोधन के आधार पर, किसी भी समय 'लाइफ ट्रस्टियों' की संख्या, कुल ट्रस्टियों की संख्या के एक-चौथाई से अधिक नहीं हो सकती।" याचिकाकर्ता का तर्क है कि ट्रस्ट इस प्रावधान का "स्पष्ट और लगातार उल्लंघन" कर रहा है।