Loan : अधिकाश बैंक उन लोगों को लोन देना पसंद करते है। जो लोग लोन के बदले संपति कोलैटरल के रूप में रखते है। कोलैटरल बैंक के लिए एक सुरक्षा जाल के रूप में काम करता है, जब लोन लेने वाला लोन की राशि को वापस नहीं कर पाता है। ये साधारण सी बात है कि एफडी और घर कोलैटरल के रूप में काम कर सकते है। लोन के लिए कोलैटरल को देने का एक दूसरा तरीका बीमा पॉलिसी भी हो सकता है। ऐसे में अगर लोन लेने वाला व्यक्ति लोन की राशि को अदा करने के पहले गुजर जाता है, तो फिर पॉलिसी का डेथ बेनिफिट होता है। वो लोन देने वाले के पास जाता है। बाकी बची हुई राशि अगर कोई हो लोन की राशि की पूर्ति को करने के बाद वो राशि लाभार्थियों के पास जाएगी। बीमा पॉलिसी को कोलैटरल के रूप में रखकर लोन लेने के कुछ फायदे और नुकसान भी है। आइए जानते है इसके बारे में।
अगर आप पास घर या फिर एफडी जैसी संपत्ति नही हैं, तो फिर ऐसी स्थिति में लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी आपको आवश्यक धन को सुरक्षित रखने में सहायता कर सकती है। कई बार ऐसे लोन लेने के लिए विचार करते है। जब उनको इंस्टेंट काफी बड़ी राशि की लोन के रूप में जरूरत होती है।
अगर आप अपने संपत्ति को कोलैटरल के रूप में रखकर रिस्क नहीं लेना चाहते है, तो फिर आपके लिए लाइफ इंश्योरेंस एक बेहतर विकल्प के रूप में काम कर सकता है।
बचे उच्च ब्याज दरों से
ऐसे लेंडर जो किसी कोलैटरल की मांग किए लोन देते है। हालांकि वे लोन के लिए ज्यादा ब्याज दर लेते है। अगर आप जीवन बीमा को कोलैटरल के रूप में रखकर लोन लेते है, तो फिर आपको कम और सस्ती ब्याज दरों में लोन का फायदा उठा सकते हैं।
लाइफ इंश्योरेंस की जो आय है। वो देश में टैक्स से मुक्त है। हालांकि, इन्वेस्ट नकद मूल्य खाते पर जो पूंजीगत उपज के परिणामस्वरूप टैक्सेबल हो सकती है।
जरुरत हो सकती है नई पॉलिसी की
कुछ लेंडर ऐसे होते है जो जीवन बीमा पॉलिसी को स्वीकार नहीं करते हैं। क्योंकि आपका मौजूदा कोलैटरल आपको अपनी मौजूदा पॉलिसी उस पॉलिसी को कोलैटरल के रूप में इस्तेमाल करने की परमिशन नहीं देता है। अगर ऐसा होता है, तो फिर आपको नई पॉलिसी को खरीदने की जरूरत पड़ सकती है और आपको अपनी जो नई पॉलिसी होगी उस पॉलिसी को कोलैटरल के रूप में रखना होगा।
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