Success Story : पद्मश्री मुकुटमोनी मोइरंगथेम जो हैं वो किसी पहचान की मोहताज नहीं हैं। उन्होंने हाथों से जूते को बुनने की जो महारत हासिल की। जिससे उन्होंने अपनी देश-विदेश में बेहद खास पहचान बनाई हैं। मुक्ता शूज़ इंडस्ट्री की मुकुटमोनी मोइरंगथेम हैं। उनके हाथों से बने हुए जूते इतने अधिक खास हैं। कि इस विलक्षण प्रतिभा के लिए और उनकी विशेषज्ञता के लिए मोइरंगथेम पद्मश्री पुरस्कार से नवाजी गईं। चलिए जानते हैं उनकी सफलता की कहानी।

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मुक्ता शूज़ इंडस्ट्री विदेशों में भी बहुत मांग हैं

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मणिपुर के काकचिंग में रहने वाली मुकुटमोनी मोइरंगथेम गरीबी की वजह से मजबूरी में अपनी जो बेटी हैं। उसके लिए जूते बुनने की शुरुआत करनी पड़ी थी। मगर उन्होंने सोचा नहीं था। कि उनकी ये मजबूरी उनके लिए मजबूती बन कर आएगी। 3 दशक के बाद उनकी इस विशेषज्ञता को पहचान भी मिली हैं और सम्मान भी मिला हैं। यही वजह हैं कि उनके हाथो से बना जूते देश में ही नही बल्की विदेश में भी बहुत पसंद की जाते हैं।

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32 वर्ष पहले हुई थी शुरुआत

मोइरंगथेम का जो इनोवेशन हैं। उसको एक स्कूल के शिक्षक ने समझा उन्होंने अपनी बेटी के लिए एक जोड़ी हाथ से बुने गए जूतों का ऑर्डर दिया। मोइरंगथेम ने कहा, यहां से उनका सफर शुरू हुआ। कई सारे सेना के जवानों ने भी उनके हाथों से बने हुए जूते खरीदे। उसके बाद कई लोगों को उनके हाथों से बने हुए जूते बहुत पसंद आने लगे और बहुत अधिक जूते के ऑर्डर आने लगे। इससे खुश होकर उन्होंने अपने व्यापार को बड़े स्तर में शुरू करने का निर्णय लिया और बिजनेस की शुरूआत की। वर्ष 1990 में यानी लगभग 32 वर्ष पहले खुद की कंपनी की शुरूआत की। जब उन्होंने अपनी कंपनी का नाम मुक्ता शूज़ इंडस्ट्री रखा। मुकुटमोनी उन्होंने अपने हाथों से जो उत्पाद बुने थे। उन उत्पादों को प्रदर्शन के लिए राजधानी इम्फाल के व्यापार मेले में पहुंचीं।

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बेचे 5 दिनों में 1500 जूते

मुकुटमोनी कहती हैं। कि इंफाल उनके हाथों से बने हुए जो जूते थे। उनको बहुत ही अधिक लोकप्रियता मिली। उसके बाद उन्होंने नई दिल्ली में वर्ष 1997 में दस्तक दी। नई दिल्ली के प्रगति मैदान में आयोजित मेले थे। उसमें उन्होंने 5 दिनों के भीतर 1500 जूते बेचे। उसके बाद वे एक सफल उद्यमी बन चुकी हैं। दिल्ली के जो कारोबारी हैं। उनकी सहायता से अब उनको विदेशों से भी ऑर्डर आते हैं। उनको जापान, रूस, सिंगापुर और दुबई जैसे देशों से भी ऑर्डर आते हैं।

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