Rupee Dollar Exchange Rate News: डॉलर के मुकाबले रुपया आज मजबूती के साथ बंद हुआ। आज डॉलर के मुकाबले रुपया 33 पैसे की मजबूती के साथ 83.00 रुपये के स्तर पर बंद हुआ। जानकारों के अनुसार रुपये में मतबूती का सबसे बड़ा कारण शेयर बाजार में भारी निवेश आना है। शेयर बाजार पिछले 2 दिनों से रोज करीब 1000-1000 अंक बढ़कर बंद हुआ।

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दो दिन पहले अमेरिका ने अपनी ब्याज दरों को नहीं बढ़ाया था। इसके अलावा अमेरिकी फेड के गवर्नर ने यह भी संकेत दिया था कि आने वाले साल में ब्याज दरों में कटौती शुरू होगी। इस खबर के बाद अमेरिका सहित दुनियाभर के शेयर बाजारों में तेजी का नया दौर शुरू हो गया है।

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भारत के शेयर बाजार में भी विदेशी निवेशक फिर से सक्रिया हो गए हैं। विदेशी निवेशक पिछले 2 दिनों से शेयर बाजार में भारी पैसा लगा रहे हैं। इससे भारत में डालर का फ्लो अचानक बढ़ा है। यही कारण है कि डॉलर के खिलाफ आज रुपया एकदम से भारी तेजी के साथ बंद हुआ है। आंकड़ों के अनुसार दिसंबर 2023 के दौरान रोज विदेशी निवेशकों ने करीब 3900 करोड़ रुपये का निवेश भारत के शेयर बाजार में किया है।

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आज शेयर बाजार में लगातार दूसरे दिन रिकॉर्ड तेजी जारी रही। आज निफ्टी और सेंसेक्स रिकॉर्ड ऊंचाई पर बंद हुए। अन्य सूचकांकों में निफ्टी आईटी 4.5 प्रतिशत की बढ़त के साथ आज सबसे ज्यादा बढ़ने वाला सेक्टर रहा। शेयर बाजार में इस तेजी का कारण अमेरिकी आर्थिक विकास पर छाए बादल छंटना माना जा रहा है। अगले वर्ष अमेरिका में ब्याज दरों में कटौती की संभावनाओं के कारण डॉलर अंतरराष्ट्रीय मुद्राओं के खिलाफ गिरावट के साथ ट्रेड कर रहा है।

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जानिए रुपये के कमजोर या मजबूत होने का कारण

रुपये की कीमत इसकी डॉलर के तुलना में मांग एवं आपूर्ति से तय होती है। वहीं देश के आयात एवं निर्यात का भी इस पर असर पड़ता है। हर देश अपने विदेशी मुद्रा का भंडार रखता है। इससे वह देश के आयात होने वाले सामानों का भुगतान करता है। हर हफ्ते रिजर्व बैंक इससे जुड़े आंकड़े जारी करता है। विदेशी मुद्रा भंडार की स्थिति क्या है, और उस दौरान देश में डॉलर की मांग क्या है, इससे भी रुपये की मजबूती या कमजोरी तय होती है।

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महंगे डॉलर का जानिए आप पर असर

देश में अपनी जरूरत का करीब 80 फीसदी क्रूड ऑयल का आयात करना पड़ता है। इसमें भारत को काफी ज्यादा डालर खर्च करना पड़ता है। यह देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बनाता है, जिसका असर रुपये की कीमत पर पड़ता है। अगर डॉलर महंगा होगा, तो हमें ज्यादा कीमत चुकानी पड़ती है, और अगर डॉलर सस्ता हो तो थोड़ी राहत मिल जाती है। रोज यह उठा पटक डॉलर के मुकाबले रुपये की स्थिति को बदलती रहती है।

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आजादी के समय रुपये का स्तर

एक जमाना था जब अपना रुपया डॉलर को जबरदस्त टक्कर दिया करता था। जब भारत 1947 में आजाद हुआ तो डॉलर और रुपये का दाम बराबर का था। मतलब एक डॉलर बराबर एक रुपया था। तब देश पर कोई कर्ज भी नहीं था। फिर जब 1951 में पहली पंचवर्षीय योजना लागू हुई तो सरकार ने विदेशों से कर्ज लेना शुरू किया और फिर रुपये की साख भी लगातार कम होने लगी। 1975 तक आते-आते तो एक डॉलर की कीमत 8 रुपये हो गई और 1985 में डॉलर का भाव हो गया 12 रुपये। 1991 में नरसिम्हा राव के शासनकाल में भारत ने उदारीकरण की राह पकड़ी और रुपया भी धड़ाम गिरने लगा।