Rupee closed at all time low: घरेलू इक्विटी में नकारात्मक रुख को देखते हुए सोमवार को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया 9 पैसे की गिरावट के साथ 83.35 के अपने ऑल टाइम लो पर पर बंद हुआ। विदेशी मुद्रा व्यापारियों ने कहा कि विदेशी फंड के तेजी से बाहर जाने का रुपये पर असर पड़ा।

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अंतरबैंक विदेशी मुद्रा बाजार में, रुपया 83.25 के स्तर पर खुला और डॉलर के मुकाबले ऑल टाइम लो 83.35 रुपये के स्तर पर बंद हुआ। आज इसमें 9 पैसे की गिरावट दर्ज की गई है।

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शुक्रवार को अमेरिकी मुद्रा के मुकाबले रुपया 83.26 पर बंद हुआ। इससे पहले रुपया इसी साल 13 नवंबर को डॉलर के मुकाबले अपने सबसे निचले स्तर 83.33 रुपये पर बंद हुआ था।

वैश्विक तेल बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड वायदा 0.66 प्रतिशत बढ़कर 81.14 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया। घरेलू इक्विटी बाजार के मोर्चे पर, सेंसेक्स 139.58 अंक या 0.21 प्रतिशत गिरकर 65,655.15 अंक पर बंद हुआ। निफ्टी 37.80 अंक या 0.19 प्रतिशत गिरकर 19,694.00 अंक पर आ गया।

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एक्सचेंज डेटा के अनुसार, विदेशी संस्थागत निवेशक (एफआईआई) शुक्रवार को पूंजी बाजार में शुद्ध विक्रेता थे, क्योंकि उन्होंने 477.76 करोड़ रुपये के शेयर बेचे। इस बीच, 10 नवंबर को समाप्त सप्ताह में भारत की विदेशी मुद्रा निधि 462 मिलियन अमेरिकी डॉलर घटकर 590.321 बिलियन अमेरिकी डॉलर हो गई, रिजर्व बैंक ने शुक्रवार को कहा। पिछले सप्ताह में, कुल भंडार 4.672 बिलियन अमेरिकी डॉलर बढ़कर 590.783 बिलियन अमेरिकी डॉलर हो गया था।

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जानिए रुपये के कमजोर या मजबूत होने का कारण

रुपये की कीमत इसकी डॉलर के तुलना में मांग एवं आपूर्ति से तय होती है। वहीं देश के आयात एवं निर्यात का भी इस पर असर पड़ता है। हर देश अपने विदेशी मुद्रा का भंडार रखता है। इससे वह देश के आयात होने वाले सामानों का भुगतान करता है। हर हफ्ते रिजर्व बैंक इससे जुड़े आंकड़े जारी करता है। विदेशी मुद्रा भंडार की स्थिति क्या है, और उस दौरान देश में डॉलर की मांग क्या है, इससे भी रुपये की मजबूती या कमजोरी तय होती है।

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महंगे डॉलर का जानिए आप पर असर

देश में अपनी जरूरत का करीब 80 फीसदी क्रूड ऑयल का आयात करना पड़ता है। इसमें भारत को काफी ज्यादा डालर खर्च करना पड़ता है। यह देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बनाता है, जिसका असर रुपये की कीमत पर पड़ता है। अगर डॉलर महंगा होगा, तो हमें ज्यादा कीमत चुकानी पड़ती है, और अगर डॉलर सस्ता हो तो थोड़ी राहत मिल जाती है। रोज यह उठा पटक डॉलर के मुकाबले रुपये की स्थिति को बदलती रहती है।

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आजादी के समय रुपये का स्तर

एक जमाना था जब अपना रुपया डॉलर को जबरदस्त टक्कर दिया करता था। जब भारत 1947 में आजाद हुआ तो डॉलर और रुपये का दाम बराबर का था। मतलब एक डॉलर बराबर एक रुपया था। तब देश पर कोई कर्ज भी नहीं था। फिर जब 1951 में पहली पंचवर्षीय योजना लागू हुई तो सरकार ने विदेशों से कर्ज लेना शुरू किया और फिर रुपये की साख भी लगातार कम होने लगी। 1975 तक आते-आते तो एक डॉलर की कीमत 8 रुपये हो गई और 1985 में डॉलर का भाव हो गया 12 रुपये। 1991 में नरसिम्हा राव के शासनकाल में भारत ने उदारीकरण की राह पकड़ी और रुपया भी धड़ाम गिरने लगा।