नयी दिल्ली। भारत सरकार ने चीन को व्यापार के मोर्चे पर झटका देकर सीमा विवाद पर प्रतिक्रिया देने की कोशिश की है। भारत में जगह-जगह चीनी वस्तुओं का बहिष्कार कर "चीन को सबक सिखाना चाहिए" जैसी आवाजें सामने आ रही हैं। केंद्रीय मंत्री रामदास अठावले ने तो एक कदम आगे बढ़ कर चीनी भोजन बेचने वाले रेस्तरां पर प्रतिबंध लगाने तक की मांग की है, जबकि ये भारतीय रेस्तरां हैं, जिनमें कर्मचारी भी भारतीय हैं। हालांकि सीमा विवाद को कारोबार से जोड़ना सही नहीं माना जाता। इसके कई कारण हैं। आइये नजर डालते हैं उन कारणों पर।

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जरूरी नहीं व्यापार घाटा बुरा हो

भारत जितना चीन को निर्यात करता है उससे ज्यादा आयात करता है। आयात-निर्यात के इसी अंतर को व्यापार घाटा या ट्रेड डेफिसिट कहा जाता है। आम तौर पर व्यापार घाटे को बुरा माना जाता है। मगर व्यापार घाटा / अधिशेष सिर्फ अकाउंटिंग प्रेक्टिस हैं और किसी देश के लिए व्यापार घाटा होने से घरेलू अर्थव्यवस्था कमजोर या खराब नहीं हो जाती। उदाहरण के लिए टॉप 25 देश जिनके साथ भारत व्यापार करता है उनमें यूएस, यूके और नीदरलैंड के साथ इसका व्यापार अधिशेष है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि भारतीय अर्थव्यवस्था इन तीनों में से किसी से भी मजबूत या बेहतर है। इसी तरह कई अन्य देशों के साथ भारत का व्यापार घाटा है, जिनमें चीन के अलावा फ्रांस, जर्मनी, नाइजीरिया, दक्षिण अफ्रीका, यूएई, कतर, रूस, दक्षिण कोरिया, जापान, वियतनाम, इंडोनेशिया आदि शामिल हैं। इसका मतलब ये बिल्कुल नहीं है कि भारत की इकोनॉमी इन सभी देशों से खराब है। दरअसल एक स्तर पर कोई भी देश आत्मनिर्भर नहीं है और इसीलिए व्यापार एक ऐसा शानदार विचार है।

गरीबों पर पड़ेगा बुरा असर

चीन के साथ कारोबार रोकने से गरीबों पर असर पड़ेगा। उदाहरण के लिए यदि चीनी एसी को जापान के महंगे एसी या कम क्षमता वाले एसी से बदल दिया जाए तो अमीर भारतीय फिर भी इस प्रतिबंध से बच सकते हैं क्योंकि वे महंगा एसी खरीद सकेंगे। मगर बहुत से निम्न वर्ग के लोगों को कम क्षमता वाले एसी से गुजारा करना होगा या फिर महंगा एसी खरीदना होगा, जो उन पर अधिक बोझ डालेगा। वैसे भी वे चीनी उत्पाद जो भारत में हैं उनके लिए पहले से ही भुगतान कर दिया गया है। उनकी बिक्री पर प्रतिबंध लगाने या उनसे बचने से भारतीय लोग यहीं के रिटेल विक्रेताओं को नुकसान पहुँचाएंगे।

भारतीय उत्पादकों और निर्यातकों को होगा नुकसान

कुछ लोगों का तर्क है कि चीन के साथ व्यापार करने से कई भारतीय उत्पादकों को नुकसान होता है। यह सच है, लेकिन यह भी सच है कि अधिक बेहतर भारतीय उत्पादकों और व्यवसायों को इससे मदद मिलती है और केवल कम कुशल भारतीय उत्पादकों को नुकसान होता है। यह ध्यान रखना जरूरी है कि चीन से कई कच्चे सामान भी आते हैं जिन्हें फाइनल प्रोडक्ट बनाने के लिए उपयोग किया जाता है। फिर इन्हीं का घरेलू भारतीय बाजार के साथ-साथ वैश्विक बाजार में भी निर्यात भी किया जाता है। चीनी आयात पर प्रतिबंध से इन सभी व्यवसायों को नुकसान होगा जबकि वे पहले से ही बचे रहने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

चीन पर कम होगा प्रभाव

कारोबार रोकने से भारत को अधिक नुकसान होगा, जबकि इससे चीन पर बेहद कम फर्क पड़ेगा। इसे आंकड़ों से समझतें हैं। चीन भारत के निर्यात में 5 फीसदी और भारत के आयात में 14 फीसदी हिस्सेदारी रखता है। जबकि भारत चीन के कुल निर्यात में सिर्फ 3 फीसदी और आयात में 1 फीसदी से भी कम योगदान रखता है। मामला ये है कि अगर दोनों देशों के बीच कारोबार रोका जाए तो चीन अपने निर्यात का केवल 3 फीसदी और अपने आयात का 1 फीसदी खोएगा, जबकि भारत अपने निर्यात का 5 फीसदी और 14 फीसदी आयात खोएगा।

भारत की नीतिगत विश्वसनीयता को लगेगी चोट

यह भी सुझाव दिया गया है कि भारत को चीन के साथ मौजूदा कॉन्ट्रैक्ट पर फिर से विचार करना चाहिए। ध्यान दें कि निकट भविष्य में यह लोगों की भावनाओं को आहत शांत कर सकता है, मगर यह भारत जैसे देश के लिए बेहद हानिकारक होगा जो विदेशी निवेश को आकर्षित करने की कोशिश कर रहा है। यदि कोई देश नीतियों को रातोंरात बदले, नए टैक्स फौरी तौर पर लगा दे या सरकार खुद कॉन्ट्रैक्ट रोक दे तो कोई भी निवेशक निवेश नहीं करेगा। सही मायनों में भारत को अपनी प्रतिस्पर्धा क्षमता बढ़ाकर वैश्विक व्यापार में बड़ा हिस्सा हासिल करने की कोशिश करनी चाहिए। भारत का इस समय विश्व व्यापार में काफी कम हिस्सा है। यदि सावधान नहीं हुआ गया तो बहुत छोटे देश भी आगे निकल सकते हैं।