Deal Between Anil & Mukesh Ambani : मुकेश अंबानी और उनके छोटे भाई अनिल अंबानी के बीच एक डील हुई है। मुकेश की कंपनी अनिल की कंपनी रिलायंस कम्युनिकेशन्स का टावर और फाइबर बिजनेस खरीदने जा रही है। दोनों पक्षों के बीच यह डील 3700 करोड़ रु की है। मुकेश अंबानी की रिलायंस जियो ये डील करेगी, जिसके लिए इसको नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) ने हरी झंडी दिखा दी है।
देश की सबसे बड़ी टेलीकॉम कंपनी रिलायस जियो की एक सब्सिडरी कंपनी है रिलायंस प्रोजेक्ट्स एंड प्रॉपर्टी मैनेजमेंट सर्विसेज। यही कंपनी रिलायंस इन्फ्राटेल (आरआईटीएल) को खरीदेगी। इसके पास 1.78 लाख रूट किलोमीटर की फाइबर एसेट है। साथ ही इसके पास देश में 43,540 मोबाइल टावर हैं।
आपको बता दें कि आरआईटीएल रिलायंस कम्युनिकेशंस की टावर और फाइबर एसेट्स की होल्डिंग कंपनी है। इस पर 45,000 करोड़ रुपये से अधिक का कर्जा है। इस कर्जे का भुगतान करने में यह विफल रही। इसी कारण इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (आईबीसी) के तहत अनिल अंबानी ने रिलायंस कम्युनिकेशंस के चेयरमैन पद से इस्तीफा दे दिया था। उन्होंने यह इस्तीफा 2019 में दिया था। ये जो 45000 करोड़ रु का कर्ज है, उसमें से आरआईटीएल पर 41,500 करोड़ रु का लोन है।
बीते सोमवार को एनसीएलटी ने जियो को आरआईटीएल के अधिग्रहण के लिए हरी झंडी दिखा दी है। एनसीएलटी ने जियो से 3720 करोड़ रुपये जमा करने को कहा है। ये पैसा देश के सबसे बड़े बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) के एस्क्रो अकाउंट में जमा किया जाना है। ऐसा इसलिए ताकि आर-कॉम के टावर और फाइबर एसेट की खरीदने की प्रोसेस पूरी हो सके। एक एस्क्रो एक कॉन्ट्रैक्चुअल अरेंजमेंट है जिसमें एक थर्ड पार्टी लेनदेन करने वाली पार्टियों द्वारा सहमत शर्तों पर निर्भर डिस्ट्रिब्यूशन के साथ प्राथमिक लेन-देन करने वाली पार्टियों के लिए पैसा या संपत्ति प्राप्त करता है और डिस्ट्रिब्यूट करता है।
4 मार्च 2020 को आरआईटीएल की कमिटी ऑफ क्रेडिटर्स (लेनदारों की समिति) ने 100 प्रतिशत मत के साथ रिलायंस जियो के रेजॉल्यूशन प्लान को हरी झंडी दिखा दी थी। यानी इसकी संपत्ति जियो खरीदेगी, इस योजना को मंजूरी दे दी थी।
रिलायंस प्रोजेक्ट्स ने किया था आवेदन
रिलायंस प्रोजेक्ट्स ने हाल ही में एनसीएलटी में एक अर्जी लगाई थी, जिसमें कहा था कि सॉल्यूशन प्लान को पूरा करने में देर हो रही है। साथ ही इसने यह भी कहा था कि रिलायंस इंफ्राटेल को काफी घाटा हो रहा है और सॉल्यूशन प्रोसेस में देरी से आरआईटीएल की एसेट वैल्यू और बेकार होगी।
रिलायंस प्रोजेक्ट्स एंड प्रॉपर्टी मैनेजमेंट सर्विसेज ने भी अपनी दलील दी कि क्यों अधिग्रहण में देरी हुई। इसने कहा कि समाधान योजना के कार्यान्वयन में देरी राशि डिस्ट्रिब्यूट करने पर लंबित कार्यवाही और 'नो ड्ययूज' सर्टिफिकेट जारी करना देरी का कारण था। एक बार इंटर-क्रेडिटर का निपटारा हो जाने के बाद रेजोल्यूशन फंड को उधारदाताओं के बीच वितरित कर दिया जाएगा। पैसे के वितरण को लेकर कानूनी लड़ाई में कई बैंक शामिल हैं। इनमें एसबीआई, दोहा बैंक, स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक और अमीरात बैंक शामिल हैं।
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