RBI did not change the repo rate : भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास ने इस बार रेपो रेट में कोई बदलाव न करने की घोषणा की है। इस प्रकार से रेपो रेट 6.5 फीसदी पर बना रहेगा। आरबीआई की इस घोषणा से लोन के रेट महंगे होने की आशंका कम हो गई है।

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आरबीआई की तीन दिनों की मौद्रिक नीति समिति की बैठक आज खत्म होने के बाद गवर्नर शक्तिकांत दास ने इस बैठक में लिए फैसलों की जानकारी दी। रिजर्व बैंक ने बताया है कि रेपो रेट में कोई बदलाव नहीं करने का फैसला सर्वसम्मत से लिया गया है। आरबीआई पिछले साल मई से लेकर अब तक रेपो रेट में 250 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी कर चुका है।

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आरबीआई गवर्नर दास ने ग्लोबल बैंकिंग क्राइसिस पर चिंता जताते हुए कहा कि वैश्विक अर्थव्यवस्था अशांति के नए दौर का सामना कर रही है। विकसित देशों में बैंकिंग क्षेत्र में उथल-पुथल पर आरबीआई कड़ी नजर रख रहा है।

दास ने बताया कि अप्रैल-जून 2023 में जीडीपी रेट 7.8 फीसदी और जुलाई-सितंबर 2023 अनुमान को 6.2 फीसदी पर बरकरार रखा गया है। इसके अलावा अक्टूबर-दिसंबर 2023 जीडीपी रेट 6 फीसदी से बढ़ाकर 6.1 फीसदी और जनवरी-मार्च 2024 जीडीपी रेट अनुमान को 5.8 फीसदी से 5.9 फीसदी किया गया है।

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रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास ने कहा कि वित्त वर्ष 2023-24 के लिए मुद्रास्फीति का अनुमान 5.2 फीसदी रखा गया है. चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में मुद्रास्फीति 5.1 फीसदी रहने का अनुमान है।

RBI मॉनिटरिंग कमेटी की मीटिंग की 10 बड़ी बातें

-आरबीआई ने ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं किया
-आरबीआई ने रेपो रेट 6.5 फीसदी पर स्थिर रखा
-एमपीसी सदस्यों ने सर्वसम्मति से फैसला लिया
-ब्याज दरें आगे स्थिति देखकर तय होंगी
-6 में से 5 सदस्य अकोमोडेटिव रुख वापसी के पक्ष में
-महंगाई अभी भी हमारे लक्ष्य से ज्यादा बनी हुईहै
-चालू वित्तीय वर्ष के लिए जीडीपी का अनुमान 6.4 फीसदी से बढ़ाकर 6.5 फीसदी किया
-चालू वित्तीय वर्ष में सीपीआई महंगाई दर अनुमान 5.3 फीसदी से घटाकर 5.2 फीसदी किया
-इकोनॉमी की जरूरत के मुताबिक लिक्विडिटी मैनेजमेंट करते रहेंगे
-करेंट अकाउंट घाटा काबू में रहने की उम्मीद

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मोदी सरकार में रेपो रेट की हिस्ट्री

मोदी सरकार में रेपो रेट की हिस्ट्री काफी रोचक है। पूरे मोदी सरकार के कार्यकाल में यह दर कभी उतना नहीं रही जितनी दर ठीक मोदी सरकार के शपथ के ठीक पहले थी। जब मोदी सरकार ने कार्यकाल संभाला तो रेपो रेट की दर 8 फीसदी थी, जो फिर कभी उतनी नहीं हुई है।

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ये है रेपो रेट का सफर

-8 फरवरी 23 को 6.50 फीसदी
-7 दिसंबर 22 को 6.25 फीसदी

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-30 सितंबर 22 को 5.90 फीसदी
-5 अगस्त 22 को 5.40 फीसदी

-8 जून 22 को 4.90 फीसदी

-4 मई 22 को 4.40 फीसदी
-10 फरवरी 22 को 4 फीसदी
-8 दिसंबर 21 को 4 फीसदी
-8 अक्टूबर 21 को 4 फीसदी
-6 अगस्त 21 को 4 फीसदी
-4 जून 21 को 4 फीसदी
-7 अप्रैल 21 को 4 फीसदी
-5 फरवरी 21 को 4.00 फीसदी
-4 दिसंबर 20 को 4.00 फीसदी
-9 अक्टूबर 20 को 4.00 फीसदी
-6 अगस्त 20 को 4.00 फीसदी
-22 मई 2020 को 4.00 फीसदी
-27 मार्च 2020 को 4.40 फीसदी
-4 अक्टूबर 2019 को 5.15 फीसदी
-7 अगस्त 2019 को 5.40 फीसदी
-6 जून 19 को 5.75 फीसदी
-04 अप्रैल 19 को 6.00 फीसदी
-07 फरवरी 19 को 6.25 फीसदी
-05 दिसंबर 18 को 6.50 फीसदी
-05 अक्टूबर 18 को 6.50 फीसदी
-01 अगस्त 18 को 6.50 फीसदी
-06 जून 18 को 6.25 फीसदी
-05 अप्रैल 18 को 6.00 फीसदी
-07 फरवरी 18 को 6.00 फीसदी
-06 दिसंबर 17 को 6.00 फीसदी
-04 अक्टूबर 17 को 6.00 फीसदी
-02 अगस्त 17 को 6.00 फीसदी
-08 जून 17 को 6.25 फीसदी
-06 अप्रैल 17 को 6.25 फीसदी
-08 फरवरी 17 को 6.25 फीसदी
-07 दिसंबर 16 को 6.25 फीसदी
-04 अक्टूबर 16 को 6.25 फीसदी
-05 अप्रैल 16 को 6.50 फीसदी
-29 सितंबर 15 को 6.75 फीसदी
-02 जनवरी 15 को 7.25 फीसदी
-04 मार्च 15 को 7.50 फीसदी
-15 जनवरी 15 को 7.75 फीसदी
-28 जनवरी 14 को 8.00 फीसदी

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मॉनिटरी पॉलिसी में इस्तेमाल होने वाले शब्दों का मतलब

क्या होती है रेपो रेट

रेपो रेट वह दर होती है जिस पर बैंकों को आरबीआई कर्ज देता है. बैंक इस कर्ज से ग्राहकों को लोन देते हैं। रेपो रेट कम होने से मतलब है कि बैंक से मिलने वाले कई तरह के कर्ज सस्ते हो जाएंगे, जैसे कि होम लोन, व्हीकल लोन वगैरह।

क्या होती है रिवर्स रेपो रेट

जैसा इसके नाम से ही साफ है, यह रेपो रेट से उलट होता है। यह वह दर होती है जिस पर बैंकों को उनकी ओर से आरबीआई में जमा धन पर ब्याज मिलता है। रिवर्स रेपो रेट बाजारों में नकदी की तरलता को नियंत्रित करने में काम आती है. बाजार में जब भी बहुत ज्यादा नकदी दिखाई देती है, आरबीआई रिवर्स रेपो रेट बढ़ा देता है, ताकि बैंक ज्यादा ब्याज कमाने के लिए अपनी रकम उसके पास जमा करा दे।

क्या होती है सीआरआर

देश में लागू बैंकिंग नियमों के तहत हरेक बैंक को अपनी कुल नकदी का एक निश्चित हिस्सा रिजर्व बैंक के पास रखना होता है। इसे ही कैश रिजर्व रेश्यो या नकद आरक्षित अनुपात कहते हैं।

क्या होती है एसएलआर

जिस दर पर बैंक अपना पैसा सरकार के पास रखते है, उसे एसएलआर कहते हैं। नकदी की तरलता को नियंत्रित करने के लिए इसका इस्तेमाल किया जाता है। कमर्शियल बैंकों को एक खास रकम जमा करानी होती है जिसका इस्तेमाल किसी इमरजेंसी लेन-देन को पूरा करने में किया जाता है। आरबीआई जब ब्याज दरों में बदलाव किए बगैर नकदी की तरलता कम करना चाहता है तो वह सीआरआर बढ़ा देता है, इससे बैंकों के पास लोन देने के लिए कम रकम बचती है।