नयी दिल्ली। सरकार की तरफ से माइकल देवव्रत पात्रा को भारतीय रिजर्व बैंक या आरबीआई का डिप्टी गवर्नर नियुक्त किया गया है। पात्रा, जो इस समय आरबीआई में कार्यकारी निदेशक हैं, को पूर्व डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य के समय से पहले दिये गये इस्तीफे के लगभग छह महीने बाद नियुक्त किया गया है। पात्रा अपनी नियुक्ति के समय से तीन साल के लिए आरबीआई के डिप्टी गवर्नर रहेंगे। मगर बता दें कि पात्रा की नियुक्ति की तारीख अभी तय नहीं की गई है। इस समय आरबीआई में तीन डिप्टी गवर्नर हैं, जिनमें एनएस विश्वनाथन, बीपी कानूनगो और एमके जैन शामिल हैं। इस लिहाज से पात्रा चौथे डिप्टी गवर्नर होंगे। शक्तिकांत दास इस समय आरबीआई के गवर्नर हैं।

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कौन हैं माइकल पात्रा
आरबीआई के नये डिप्टी गवर्नर माइकल पात्रा ने आईआईटी मुंबई से इकोनॉमिक्स में पीएचडी की हुई है। वे हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के फेलो रहे हैं। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में पात्रा ने फाइनेंशियल स्थिरता को लेकर पोस्ट डॉक्टोरल रिसर्च किया था। पात्रा 1985 में ही आरबीआई से जुड़ गये थे। उन्होंने कई अहम पदों पर काम किया है। उन्हें अक्टूबर 2005 में मौद्रिक नीति विभाग में भेजा गया था, जबकि इससे पहले वे आर्थिक विश्लेषण विभाग में सलाहकार थे।

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इसलिए दिया था विरल आचार्य ने इस्तीफा
आचार्य ने अपने कार्यकाल से छह महीने पहले ही जुलाई 2019 में इस्तीफा दे दिया था। हालांकि आचार्य ने अपने इस्तीफे के लिए व्यक्तिगत कारणों का हवाला दिया था, लेकिन ऐसा अनुमान लगाया गया था कि उन्होंने आरबीआई के केंद्र सरकार के साथ विभिन्न मुद्दों पर तकरार की वजह से पद छोड़ा था, जिनमें केंद्र सरकार को सरप्लस का स्थानांतरण, गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों के वर्गीकरण और मुद्रास्फीति-केंद्रित ब्याज दरों के लिए मानदंड जैसे मामले शामिल हैं।

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आचार्य ने की थी आरबीआई की स्वतंत्रता की वकालत
विरल आचार्य ने सरकारी बैंकों की निगरानी के लिए आरबीआई की स्वतंत्रता की वकालत की थी। उन्होंने इस बारे में एक कार्यक्रम में भाषण दिया था। आचार्य के भाषण के बाद केंद्र सरकार के साथ टकराव के बीच तत्कालीन गवर्नर उर्जित पटेल ने दिसंबर 2018 में इस्तीफा दे दिया था। पटेल के आरबीआई से बाहर जाने से सरकार और आरबीआई के बीच के मुद्दों पर नई चिंता पैदा हो गई थी।

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