LIC Stock Crash: देश की सबसे बड़ी जीवन बीमा कंपनी Life Insurance Corporation of India के शेयरों में 4 अगस्त को तेज गिरावट देखने को मिली। शुरुआती कारोबार में शेयर करीब 9% तक टूट गया। इस गिरावट के बाद निवेशकों के बीच सवाल उठने लगे कि क्या कंपनी के कारोबार में कोई बड़ी समस्या आ गई है या इसके पीछे कोई और वजह है। दरअसल, इस गिरावट की सबसे बड़ी वजह कंपनी के बिजनेस से जुड़ी नहीं बल्कि सरकार की हिस्सेदारी बिक्री (Disinvestment) की योजना है। केंद्र सरकार ने LIC में अपनी हिस्सेदारी बेचने के लिए Offer for Sale (OFS) लॉन्च किया है, जिसके चलते शेयर पर दबाव देखने को मिला।

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LIC में सरकार बेच रही है 2.5% हिस्सेदारी

सरकार ने LIC में अपनी 2.5% हिस्सेदारी बेचने का फैसला किया है। इसके साथ ही सरकार के पास Green Shoe Option भी रखा गया है। यदि निवेशकों की ओर से अच्छी मांग आती है तो सरकार अतिरिक्त 4% हिस्सेदारी भी बेच सकती है। यानी कुल मिलाकर सरकार 6.5% तक हिस्सेदारी बाजार में बेच सकती है। OFS के लिए सरकार ने ₹382 प्रति शेयर का फ्लोर प्राइस तय किया है। यह कीमत LIC के 3 अगस्त के क्लोजिंग प्राइस ₹428.50 से करीब 11% कम है। यही वजह रही कि डिस्काउंट पर शेयर उपलब्ध होने की खबर के बाद बाजार में बिकवाली बढ़ गई और शेयर शुरुआती कारोबार में करीब ₹390.50 तक फिसल गया।

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सरकार जुटा सकती है ₹31,000 करोड़ से ज्यादा

सरकार Green Shoe Option का भी इस्तेमाल करती है तो करीब 82 करोड़ शेयर बाजार में बेचे जा सकते हैं। फ्लोर प्राइस ₹382 के हिसाब से सरकार इस डील के जरिए लगभग ₹31,410 करोड़ जुटा सकती है। यह मौजूदा वित्त वर्ष के सरकार के डिसइन्वेस्टमेंट कार्यक्रम का सबसे बड़ा कदम माना जा रहा है।

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OFS में कौन कर सकता है निवेश?

OFS के तहत निवेश की प्रक्रिया दो चरणों में रखी गई है।

  • 4 अगस्त: केवल गैर-रिटेल (Institutional) निवेशकों के लिए।
  • 5 अगस्त: रिटेल निवेशकों यानी आम निवेशकों के लिए आवेदन का मौका।

रिटेल निवेशक अपने ब्रोकिंग प्लेटफॉर्म के जरिए OFS में आवेदन कर सकते हैं।

सरकार हिस्सेदारी क्यों बेच रही है?

सरकार का उद्देश्य केवल राजस्व जुटाना नहीं है। इसके पीछे दूसरा और अधिक महत्वपूर्ण कारण Minimum Public Shareholding (MPS) के नियमों का पालन करना भी है। भारतीय शेयर बाजार के नियमों के अनुसार सूचीबद्ध कंपनियों में एक निश्चित प्रतिशत शेयर आम निवेशकों के पास होना जरूरी होता है। LIC की लिस्टिंग के बाद भी सरकार की हिस्सेदारी बहुत अधिक बनी हुई है। ऐसे में धीरे-धीरे पब्लिक शेयरहोल्डिंग बढ़ाना आवश्यक है ताकि कंपनी नियामकीय नियमों का पालन कर सके।

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LIC में अभी भी सरकार की बड़ी हिस्सेदारी

30 जून 2026 तक उपलब्ध शेयरहोल्डिंग आंकड़ों के मुताबिक सरकार के पास LIC में करीब 96.5% हिस्सेदारी बनी हुई है। वहीं करीब 20.92 लाख रिटेल निवेशकों के पास केवल 1.55% हिस्सेदारी है। यानी सरकार की यह हिस्सेदारी बिक्री कंपनी से बाहर निकलने का संकेत नहीं बल्कि पब्लिक फ्लोट बढ़ाने की प्रक्रिया का हिस्सा है।

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सरकार ने दोहराया LIC पर भरोसा

लोक संपत्ति प्रबंधन विभाग (DIPAM) के सचिव अरुणी चावला ने कहा कि LIC भारत की वित्तीय व्यवस्था की आधारशिला है। उन्होंने इसे देश की सबसे बड़ी जीवन बीमा कंपनी और मार्केट कैपिटलाइजेशन के लिहाज से दूसरी सबसे बड़ी सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी बताया। उन्होंने यह भी कहा कि LIC भारत का चौथा सबसे मूल्यवान ब्रांड है और दुनिया के सबसे मजबूत बीमा ब्रांड्स में शामिल है। कंपनी के नाम 24 घंटे में सबसे अधिक जीवन बीमा पॉलिसियां बेचने का Guinness World Record भी दर्ज है।

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LIC शेयर का प्रदर्शन कैसा रहा?

OFS की घोषणा से पहले 3 अगस्त को LIC का शेयर ₹428.50 पर बंद हुआ था।

  • पिछले 1 सप्ताह में शेयर में हल्की बढ़त रही।
  • पिछले 1 महीने में मामूली कमजोरी देखने को मिली।
  • 2026 की शुरुआत से अब तक शेयर सीमित बढ़त में है।
  • पिछले 1 साल में शेयर लगभग 4% नीचे रहा।
  • हालांकि पिछले 3 वर्षों में 30% से अधिक का रिटर्न दिया है।

फिलहाल कंपनी का मार्केट कैपिटलाइजेशन ₹5.42 लाख करोड़ से अधिक है।

निवेशकों को क्या करना चाहिए?

विशेषज्ञों का मानना है कि OFS आने पर शेयरों में अल्पकालिक दबाव आना सामान्य बात होती है क्योंकि बाजार में बड़ी संख्या में शेयर डिस्काउंट पर उपलब्ध हो जाते हैं। हालांकि इसका यह मतलब नहीं है कि कंपनी के बिजनेस में कोई कमजोरी आई है। LIC आज भी देश की सबसे बड़ी जीवन बीमा कंपनी है, जिसके पास मजबूत ब्रांड, विशाल ग्राहक आधार और सरकार का नियंत्रण कायम है। ऐसे में निवेशकों को केवल शेयर की गिरावट देखकर फैसला लेने के बजाय उसके पीछे की वजह को समझना चाहिए।

LIC के शेयर में आई हालिया गिरावट का मुख्य कारण सरकार का OFS के जरिए हिस्सेदारी बेचना है, न कि कंपनी के कारोबार में कोई कमजोरी। सरकार इस प्रक्रिया के जरिए एक तरफ डिसइन्वेस्टमेंट से राजस्व जुटाना चाहती है, वहीं दूसरी ओर Minimum Public Shareholding के नियमों का पालन भी सुनिश्चित करना चाहती है। अब बाजार की नजर इस बात पर रहेगी कि OFS को निवेशकों से कितना अच्छा रिस्पॉन्स मिलता है और इसका LIC के शेयर की आगे की चाल पर क्या असर पड़ता है।