नयी दिल्ली। अब से कुछ हफ्तों बाद वित्त वर्ष 2021-22 के लिए बजट पेश किया जाएगा। मौजूदा स्थिति के लिहाज से इसे स्वतंत्र भारत में किसी भी वित्त मंत्री द्वारा तैयार किया जाने वाला अब तक का सबसे मुश्किल बजट माना जा रहा है। अर्थव्यवस्था अभी भी कोरोना महामारी और पहली तिमाही में लगे लॉकडाउन के झटके से रिकवरी कर रही है। आधिकारिक अनुमानों के मुताबिक वित्त वर्ष 2020-21 की पहली तिमाही में जीडीपी में 24 प्रतिशत की गिरावट आई। फिर दूसरी तिमाही में, अच्छी रिकवरी के बावजूद, 7.5 प्रतिशत की गिरावट आई। ऐसे में बड़ा सवाल ये है कि क्या आगामी बजट में इनकम टैक्स का बोझ कम किया जा सकता है?

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रोजगार और महंगाई
पिछले कई महीनों से खुदरा महंगाई दर 6 फीसदी से ऊपर बनी हुई है। वहीं कुल रोजगार दर दूसरी तिमाही में 38 फीसदी से कम रही, जबकि पहली तिमाही में 31 फीसदी रही थी। मगर ये 2016-17 के 43 फीसदी के मुकाबले बहुत नीचे है। रोजगार, महंगाई, फिस्कल डेफिसिट और निर्यात को देखते हुए जानकार कहते हैं कि जीडीपी में सुधार चालू वर्ष की दूसरी छमाही में जारी रहेगा, लेकिन तीसरी और चौथी में ग्रोथ अभी भी नकारात्मक बने रहने की संभावना है। आरबीआई ने 2020-21 में जीडीपी में 7.5 फीसदी की गिरावट का अनुमान लगाया है।

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टैक्स से संबंधित विचार
जानकार मानते हैं कि जीडीपी में 5 फीसदी गिरावट को बनाए रखने के लिए कुछ कम नुकसान वाले उपायों पर विचार किया जा सकता है, जिनमें व्यक्तिगत आयकर छूट सीमा में कमी शामिल है। यानी इनकम टैक्स में राहत की संभावना कम है। इसके अलावा कॉर्पोरेट टैक्स पर वन-टाइम-वन-ईयर सरचार्ज पर भी विचार किया जा सकता है, मगर इससे इससे सितंबर 2019 में वित्त मंत्री द्वारा कंपनी टैक्स रेट में कटौती की विश्वसनीयता को नुकसान होगा।

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आयात शुल्क न बढ़े
जानकार कहते हैं कि आयात शुल्क दरों में वृद्धि नहीं की जानी चाहिए। अगर पूर्व और दक्षिण-पूर्व एशिया में वैश्विक और क्षेत्रीय वैल्यू चेन में अधिक भागीदारी के माध्यम से निर्यात मांग को बढ़ाना है तो आयात शुल्क दरों को 2017 के स्तर पर वापस लाने की आवश्यकता है।