नयी दिल्ली। आर्थिक मोर्चे पर एक बुरी खबर आई है। भारत का राजकोषीय घाटा चालू वित्त वर्ष में नवंबर तक बढ़ कर 10.75 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया। ये सालाना बजट अनुमान का करीब 135.1 फीसदी है। यानी भारत का राजकोषीय घाटा अप्रैल-नवंबर के दौरान बजटीय अनुमान के 135.1 फीसदी पर पहुंच गया। सरकारी राजस्व (Revenue) और व्यय (Expenditure) के बीच का अंतर खर्च कम करने के प्रयासों के बावजूद अधिक रहा। पिछले साल नवंबर तक देश का राजकोषीय घाटा बजट के अनुमान का 114.8 फीसदी पर था।

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कितनी रहा रेवेन्यू
देश की राजस्व प्राप्ति (Revenue Receipts) बढ़ कर 8.13 लाख करोड़ रुपये हो गई, जो कि अप्रैल-नवंबर में चालू वित्त वर्ष के लिए निर्धारित लक्ष्य का 40.2% है। पिछले साल नवंबर तक बजट का 50.1 फीसदी रहा था। कुल प्राप्तियां बढ़ कर 8.31 लाख करोड़ रुपये हो गई, जो पिछले साल के 48.6 फीसदी की तुलना में बजट अनुमान की 37 फीसदी थी।

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कितना हुआ खर्च
कुल खर्च 19.06 लाख करोड़ रुपये रहा। पिछले वर्ष खर्च किए गए 65.3% की तुलना में पूरे वर्ष के लक्ष्य का यह 62.7% है। इसमें से 2.41 लाख करोड़ रु पूंजीगत व्यय के हैं। वहीं 16.65 लाख करोड़ रु राजस्व खर्च के हैं। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि चालू वित्त वर्ष के बजट में 2020-21 के लिए राजकोषीय घाटे के 7.96 लाख करोड़ रु रहने का अनुमान रखा गया है, जो जीडीपी का 3.5 फीसदी है।

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क्या होता है राजकोषीय घाटा
राजकोषीय घाटा यानी फिस्कल डेफिसिट। इसमें डेफिसिट शब्द सरप्लस का विलोम है। जब सरकार अपनी आय से अधिक खर्च करती है तो उस अधिक खर्च को राजकोषीय घाटा कहते हैं। अगर सरकार खर्च से अधिक आय प्राप्त करे तो उस सरप्लस यानी फायदा माना जायेगा। सरकार राजस्व मुख्य रूप से टैक्स और अपने व्यवसायों से हासिल करती है। पर इस आमदनी में सरकार द्वारा लिया गया उधार शामिल नहीं किया जाता।

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