मार्च 2026 भारतीय शेयर बाजार के लिए एक अहम महीना साबित हुआ। विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) ने करीब 1.23 लाख करोड़ रुपये के शेयर बेच दिए। रकम के हिसाब से यह मार्च 2020 के बाद दूसरी सबसे बड़ी बिकवाली थी। इतनी बड़ी बिकवाली के बाद उम्मीद थी कि बाजार में बड़ी गिरावट आएगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

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यहीं से सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है-आखिर ऐसा क्या बदल गया कि रिकॉर्ड विदेशी बिकवाली के बावजूद भारतीय बाजार पहले की तरह नहीं टूटा?

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Share Market की पूरी तस्वीर

अगर सिर्फ कुल बिकवाली की रकम देखी जाए तो मार्च 2026 की तस्वीर काफी डराने वाली लगती है। लेकिन बाजार को समझने के लिए सिर्फ रकम देखना काफी नहीं होता।

मार्च 2020 में FIIs के पास भारत में करीब 21 लाख करोड़ रुपये के इक्विटी एसेट्स थे। वहीं मार्च 2026 तक यह आंकड़ा बढ़कर करीब 62 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया।

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यानी कुल निवेश के मुकाबले देखें तो मार्च 2020 में बिकवाली लगभग 2.95% थी, जबकि मार्च 2026 में यह करीब 1.97% रही। इसका मतलब यह है कि बिकवाली बड़ी जरूर थी, लेकिन कुल निवेश के हिसाब से उसका असर पहले जितना नहीं था।

March 2020 vs March 2026

मार्च 2020 में पूरी दुनिया कोविड महामारी से जूझ रही थी। निवेशक तेजी से जोखिम वाले एसेट्स से पैसा निकाल रहे थे और निफ्टी कुछ ही हफ्तों में 30% से ज्यादा टूट गया था।

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वहीं मार्च 2026 की वजहें अलग थीं। उस समय कच्चा तेल कुछ समय के लिए 118 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया था। अमेरिका-ईरान तनाव बढ़ रहा था और वैश्विक निवेशकों का पैसा AI से जुड़े बाजारों, खासकर ताइवान और दक्षिण कोरिया की तरफ भी जा रहा था।

यानी इस बार बिकवाली की वजह वैश्विक निवेश रणनीति और भू-राजनीतिक हालात थे, न कि कोविड जैसी वित्तीय घबराहट।

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घरेलू निवेशकों ने कैसे संभाला बाजार?

भारतीय शेयर बाजार की सबसे बड़ी ताकत अब घरेलू निवेशक बन चुके हैं।

पिछले कुछ वर्षों में म्यूचुअल फंड, SIP, बीमा कंपनियों और पेंशन फंड का निवेश लगातार बढ़ा है। यही वजह है कि जब FIIs बिकवाली करते हैं तो घरेलू संस्थागत निवेशक लगातार खरीदारी करके बाजार को सहारा देते हैं।

आज हर महीने आने वाला SIP निवेश बाजार में एक स्थायी खरीदारी का आधार बन चुका है। बाजार गिरने पर भी SIP नहीं रुकते और यही लगातार निवेश बाजार की गिरावट को काफी हद तक संभाल लेता है।

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कुछ साल पहले तक FIIs की खरीद-बिक्री ही बाजार की दिशा तय करती थी। लेकिन अब तस्वीर बदल चुकी है। घरेलू निवेशकों की भागीदारी तेजी से बढ़ी है। यही वजह है कि विदेशी बिकवाली का असर पहले जितना बड़ा नहीं दिखता। इसका मतलब यह नहीं कि FIIs की अहमियत खत्म हो गई है, लेकिन अब वे अकेले बाजार की दिशा तय नहीं करते।

बाज़ार के लिए कोई खतरा नहीं?

ऐसा बिल्कुल नहीं है। भारतीय बाजार आज भी कई बड़े जोखिमों का सामना कर रहा है।

सबसे पहला खतरा कच्चे तेल की कीमत है। भारत अपनी जरूरत का ज्यादातर तेल आयात करता है। अगर तेल महंगा होता है तो महंगाई बढ़ सकती है, कंपनियों के मुनाफे पर दबाव आ सकता है और रुपये पर भी असर पड़ सकता है।

दूसरा बड़ा जोखिम भू-राजनीतिक तनाव है। अगर पश्चिम एशिया में हालात बिगड़ते हैं या सप्लाई चेन प्रभावित होती है तो इसका सीधा असर वैश्विक बाजारों पर पड़ सकता है।

तीसरा जोखिम वैश्विक ब्याज दरों और आर्थिक सुस्ती का है। अगर दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में कमजोरी आती है तो विदेशी निवेशक फिर से जोखिम वाले बाजारों से पैसा निकाल सकते हैं।

Market के लिए बड़ी चेतावनी

अनुभवी निवेशक शंकर शर्मा का मानना है कि भारत का अगला बड़ा बुल मार्केट जरूर आएगा, लेकिन आने वाले वर्षों में रिटर्न पहले जैसे नहीं रहेंगे।

उनके मुताबिक भविष्य में लंबी अवधि का औसत रिटर्न करीब 8-10% रह सकता है, जबकि पिछले दो दशकों में यह करीब 14-15% रहा था।

उनका कहना है कि अब बड़े इंडेक्स की बजाय छोटे लेकिन तेजी से बढ़ने वाले सेक्टर्स और कंपनियों में ज्यादा अवसर मिल सकते हैं। खासकर टेक्नोलॉजी इंफ्रास्ट्रक्चर और डेटा सेंटर जैसे क्षेत्रों पर उनकी नजर है।

निवेशकों को अब क्या करना चाहिए?

ऐसे माहौल में सबसे जरूरी है कि निवेशक घबराकर फैसले न लें।

  • SIP को नियमित जारी रखें।
  • अपने पोर्टफोलियो में समय-समय पर बदलाव की समीक्षा करें।
  • जरूरत के हिसाब से सीमित मिड और स्मॉल-कैप एक्सपोजर रखें।
  • मजबूत बैलेंस शीट और लगातार कमाई करने वाली कंपनियों को प्राथमिकता दें।
  • अचानक आने वाली गिरावट के लिए कुछ नकदी हमेशा तैयार रखें।

मार्च 2026 ने यह दिखा दिया कि भारतीय शेयर बाजार पहले जैसा नहीं रहा। अब घरेलू निवेशकों की ताकत पहले से कहीं ज्यादा बढ़ चुकी है और यही वजह है कि रिकॉर्ड विदेशी बिकवाली के बावजूद बाजार संभला रहा।

हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि जोखिम खत्म हो गए हैं। कच्चे तेल की कीमत, वैश्विक तनाव और दुनिया की आर्थिक स्थिति आने वाले समय में बाजार की दिशा तय करने में बड़ी भूमिका निभाएंगे।

ऐसे में निवेशकों के लिए सबसे सही रणनीति यही होगी कि वे लंबी अवधि की सोच रखें, नियमित निवेश जारी रखें और मजबूत कंपनियों पर भरोसा बनाए रखें।